अप्प दीपो भव: - अपना दीपक स्वयं बनें | Apna Deepak Swayam Banen Story

अप्प दीपो भव: – अपने जीवन की रोशनी (प्रेरणा) स्वयं बनें | Short Spiritual Story

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एक अंधा आदमी था। वह अपने मित्र के यहां गया। उसने मित्र के साथ काफी नई-पुरानी बातें की। सुबह से शाम हो गई, न जाने कब अंधेरा घिरने लगा। जब अंधा मित्र जाने लगा, तो उसके मित्र ने एक लालटेन उसे दे दी। उसने कहा कि मित्र बहुत अंधेरा हो गया है, तुम यह लालटेन ले जाओ। अंधे व्यक्ति ने तब हंसकर कहा, मैं तो वैसे ही अंधा हूं, मेरे लिए क्या अंधेरा, और क्या उजाला! मेरे लिए तो रोशनी और उजाले में कोई फर्क नहीं है। मित्र ने कहा, यह लालटेन मैं दूसरों के लिए तुम्हें दे रहा हूं। यह लालटेन आंख वालों के लिए है ताकि वे तुमसे न टकराएं, जो अंधेरे में तुमसे टकरा सकते हैं।

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अंधा मान गया और लालटेन लेकर निकल पड़ा। कुछ देर बाद एक आदमी उससे टकरा गया। अंधे ने कहा कि भाई मैं लालटेन लेकर चल रहा हूं। तब उस व्यक्ति ने कहा, भाई मैं तो अंधा नहीं हूं, फिर भी तुमसे टकरा गया। और जिस लालटेन की तुम बात कर रहे हो, वह तो हवा से पहले ही बुझ चुकी है।

अब सोचिए और विचार कीजिए कि:

  • मेरा अंधापन कहां-कहां है?
  • मैं अपने भीतर कौन-कौन सी कमियां देखता हूं?
  • शारीरिक, मानसिक और आत्मिक रूप से मुझ में अंधापन कहां है?
  • अपने अंधेपन को दूर करने के लिए मैं क्या उपाय करूं?
  • कौन-कौन सी ऐसी लालटेन हैं, जो मुझे जलाए रखनी हैं?
  • क्या कोई ऐसा उपाय है, जिससे मेरी लालटेन कभी न बुझे?
  • क्या मेरी लालटेन दूसरों को टकराने से बचा सकती है?
  • मैं अपनी क्षमताओं में अभिवृद्धि कैसे करूं?
  • मैं अंधे का मित्र कैसे बनूं?
  • जीवन में सच्ची रोशनी कौन सी है?

बौद्ध दर्शन में कहा गया है कि अप्प दीपो भव: अर्थात अपने दीपक आप स्वयं बनो। दूसरों के द्वारा दी गई लालटेन को अगर हम समझ नहीं सकते, तो इसे कोई भी हवा बुझा सकती है। फिर कोई भी आपसे टकरा सकता है। कहने का तात्पर्य है कि दूसरों के द्वारा थोपा गया ज्ञान किसी के जीवन में आशा और उत्साह का कारण नहीं बन सकता है। जब तक हम स्वयं ही अपने लिए उपयोगी न होंगे, तब तक दूसरे लोगों से टकराहट होती रहेगी।

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स्वर्ग तो हर कोई जाना चाहता है, लेकिन मरने को कोई भी तैयार नहीं होता है। जो दीपक रात भर जलता रहता है, अंधेरे के सीने पर डटकर रोशनी देता है, उस दीपक की आराधना होनी चाहिए। वह दीपक तो उस सूर्य से भी श्रेष्ठ है, क्योंकि सूर्य तो रात से घबराकर भाग जाता है। इसलिए जीवन में अपनी स्वचेतना और भीतरी उर्जा से ही रोशनी का जागरण करना चाहिए। किसी और की मदद या नकल, जो अपने से अनुभूत नहीं हो, वह हवा के एक झोंके से बुझ जाती है। प्राप्त ज्ञान के बोध और उसी के व्यवहारगत अनुप्रयोग से हम निर्विघ्न आगे बढ़ सकते हैं।

Image Courtesy: Pixabay.

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