खुद को खुद से पहचानें - जानें जीवन क्या है और सीखें एक खुशहाल जीवन जीने की कला

जिंदगी एक खेल है और हम सब हैं इसके खिलाड़ी – खुद को पहचानें और जीत जाएं इस खेल को!

जीवन शक्तियों का एक पुंज है और सबसे अच्छी बात यह है कि सब कुछ तुम्हारे हाथ में है। तुम अपने जीवन को जैसा बनाना चाहो, वैसा बनाने के लिए इन शक्तियों को चुन सकते हो। अगर तुम्हारे अंदर जागरूकता है तो तुम किसी भी बुरी चीज को अंदर नहीं जाने दोगे और जब कोई बुरी चीज तुम्हारे अंदर नहीं जाएगी तो तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी। यह जीवन जो तुम जी रहे हो, क्या यह शांति, आनंद, समरसता और वरदान से परिपूर्ण है? होना तो ऐसा ही चाहिए लेकिन है वास्तव में इसका उल्टा। हम हमेशा ही कष्ट और उलझन में फंसे रहते हैं।

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शरीर, मन और प्राण – प्राणी के तीन मुख्य अंग हैं। पर जीवन केवल इन तक सीमित नहीं है। साधारण चेतना में ये तीनों अंग एक दूसरे के साथ जीने वाले अभिन्न मित्र हैं और प्रकाश की गति से चलते हैं। इनकी दोस्ती कभी टूटती नहीं है। इनका अंत:संबंध बना ही रहता है। मन में कोई भाव आता है तो दिमाग उसे फौरन ग्रहण करता है और शरीर प्रतिक्रिया करता है। किसी भाव के आते ही मन तुरंत उसका हिसाब किताब करने लगता है, अच्छे बुरे को तौलता है और शरीर भी तदनुसार उसके आगे-पीछे भागने लगता है।

जीवन के ये अंग बहुत ही शक्तिशाली हैं। जो जीवन हम अभी जी रहे हैं या अब तक जीते आ रहे हैं, यह मन, प्राण और शरीर इन तीनों शक्तियों से निर्मित है। जिस समाज में हम रहते हैं, वह भी इन्हीं तीनों से बनता है। ये बहुत ही शक्तिशाली और महत्वपूर्ण है। किंतु इनमें वह सामर्थ्य नहीं है कि ये तुम्हें शांति और प्रसन्नता के जीवन की समरसता प्रदान कर सकें। या स्थाई आनंद दे सकें। ये केवल अस्थाई चीजें देते हैं।

जीवन के खेल में दो प्रकार की शक्तियां भाग ले रही हैं। खेल रही हैं। मदद कर रही है। ये दोनों शक्तियां परमात्मा का दिव्य अंश हैं। एक ओर सकारात्मक शक्तियां हैं जैसे कि धीरज और प्रेम। और दूसरी तरफ ऐसी शक्तियां हैं जो उग्र हैं, नकारात्मक हैं जैसे कि भय और क्रोध। साधारणत: हमें इसका ज्ञान नहीं होता और इनमें से कोई भी शक्ति कभी भी हमारे अंदर प्रबल हो सकती है। जब तुम सो रहे होते हो या अचेत होते हो तो क्या होता है? निम्नस्तरीय शक्तियां या आदतें तुम्हारे अंदर प्रबल हो जाती हैं। इस बात को अच्छी तरह समझने की कोशिश करो।

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जब प्रतिदिन तुम शीशे के सामने खड़े होते हो, तो क्या देखते हो? तुम्हें क्या महसूस होता है? तुम अपने आप को क्यों देखते हो? जब तुम शीशे में अपना चेहरा देखते हो तो क्या महसूस करते हो? तुम्हारे मन में क्या भाव उठते है? उन्हें महसूस करने की कोशिश करो। जब तुम शीशे में खुद को देखो तो गहराई से सोचकर अपने प्रतिबिम्ब से कहो- मैं यह नहीं हूं। और यह भी मैं नहीं हूं। यह प्रयोग बार-बार करो। अगर तुम अपने जीवन के बारे में जानना चाहते हो, तो अच्छी तरह समझ लो कि यह शरीर तुम्हारा प्रतिबिंब मात्र है। जो हम शीशे में देखते हैं, वह जीवन की छाया मात्र है। छाया को छोड़कर असल को देखने की कोशिश करें। सत्य अवश्य मिलेगा।

Image Courtesy: Pixabay

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