पार्वण श्राद्ध: आश्विन मास में ही क्यों मनाते हैं श्राद्ध? क्या है इसका कारण?

पार्वण श्राद्ध: आश्विन मास में ही क्यों मनाते हैं श्राद्ध? क्या है इसका कारण?

अकसर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को ही श्राद्ध कर्म के लिए उपयुक्त क्यों माना गया है? दरअसल शास्त्रों में इसे विज्ञान सम्मत भी माना गया है। पार्वण श्राद्ध

पार्वण श्राद्ध: आश्विन मास में ही श्राद्ध क्यों?

श्राद्ध के पांच भेदों में अन्यतम ‘पार्वण श्राद्ध’ भी है। इसलिए अमावस्या का श्राद्ध पितरों के दैनिक भोजन के समान है, परंतु आश्विन का पितृपक्ष हमारे विशिष्ट सामाजिक उत्सवों की भांति पितृगणों का सामूहिक महापर्व है। इसलिए उक्त समय में किए जाने वाले श्राद्ध को ‘पार्वण श्राद्ध’ कहते हैं। जिस प्रकार हम नित्य प्रति साधारण दशा में नियमानुसार मध्याह्न काल में ग्यारह-बारह बजे भोजन करते हैं, परंतु तिथि-त्योहार, विवाहादि महोत्सवों में प्रात: सायं और रात के बारह-बारह बजे तक भी भोजन करते हैं। जन्माष्टमी आदि विशिष्ट त्योहारों पर अर्धरात्रि में भी व्रत पारण होती है, ठीक इसी प्रकार आश्विन कालीन पितृपक्ष पितरों का सामूहिक मेला है। इस समय सभी पितर अपने पृथ्वी लोकस्थ सगे-संबंधियों के यहां बिना निमंत्रण के भी पहुंचते हैं और उनके द्वारा प्रदान किए ‘कव्य’ से परितृप्त होकर उन्हें अपने शुभ आशीर्वादों से परिपूर्ण करते हैं। पार्वण श्राद्ध | पार्वण श्राद्ध

ज्योतिर्गणना के अनुसार, मेष राशि के दश अंश पर वर्तमान सूर्य परमोच्च का होता है और तुला के दश अंश पर स्थित परम नीच का होता है। अर्थात् मेष का सूर्य पृथ्वी कक्षा से सर्वथा दूर होता है और तुला का सूर्य पृथ्वी कक्षा के सर्वथा निकट। पृथ्वीलोक पर किए गए यज्ञ आदि सब अनुष्ठान पहले सूर्यमंडल में पहुंचते हैं और फिर वहां से नियत स्थानों को जाते हैं। पार्वण श्राद्ध | पार्वण श्राद्ध

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देवताओं के निमित्त भौतिक अग्नि में विधिवत डाला हुआ ‘हवन’ सूर्य द्वारा द्युलोकस्थ (अर्थात तारे और सूरज, प्रकाशमान द्युत पदार्थों का लोक) देवताओं की तृप्ति का कारण बन जाता है, क्योंकि देवलोक सूर्यकक्षा में ही विद्यमान है, परंतु पितृगणों के निमित्त उभयविध अग्नि में हुत ‘कव्य’ पहले सूर्यमंडल में पहुंचता है और फिर सूर्यमंडल से चंद्रमंडल में जाता है। पार्वण श्राद्ध | पार्वण श्राद्ध

विज्ञानवेत्ता जानते हैं कि चंद्रमा स्वयं प्रकाशमान नहीं है, किंतु सूर्य की ही रश्मियां चंद्रमंडल को प्रकाशित करती हैं। जैसे अमावस्या को उक्त दोनों मंडलों के सान्निध्य के कारण पितरों को हमारी प्रदत्त वस्तु प्राप्त होती है। इसी प्रकार कन्या के दश अंश से तुला के दश अंश सूर्य की नीच कक्षा में विद्यमान होने के कारण अर्थात् पृथ्वी, चंद्रमंडल और सूर्यमंडल के सान्निध्य के कारण ‘कन्यागत’ सूर्य में श्राद्ध करना विज्ञान सम्मत है। चूंकि आश्विन मास में सूर्य कन्यागत अर्थात् कन्या राशि में होता है। इसलिए पितृ पक्ष को कनागत भी कहते हैं। पार्वण श्राद्ध | पार्वण श्राद्ध

Image Courtesy: Indianworship. |पार्वण श्राद्ध | पार्वण श्राद्ध

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