श्राद्ध कर्म विधि इन हिंदी: पितृपक्ष में बिना आह्वान के आते हैं पितृदेव | श्राद्ध पूजा विधि

श्राद्ध कर्म विधि – पितृपक्ष में बिना आह्वान के आते हैं पितृदेव!

कहते हैं कि पितृपक्ष में पितर तृप्त होने के लिए बिना आह्वान के ही अपने वंशज के घर आते हैं। इसलिए उनकी मुक्ति के लिए इस दौरान यथाशक्ति दान आदि जरूर दें ताकि वे तृप्त हों और आपको सुख-समृद्धि का वरदान दें। श्राद्ध कर्म विधि

हिंदू संस्कृति में जहां देवी-देवताओं के पूजन से पूर्व उन्हें आह्वान कर बुलाया जाता है, आह्वान करने के बाद श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना के उपरांत घर में सुख-शांति, समृद्धि, सुरक्षा का आशीर्वाद मांगा जाता है, वहीं पितृपक्ष एक ऐसा समय है, जिसमें बिना आह्वान किए दिवंगत पूर्वज पितरों के रूप में पृथ्वी पर रहने वाले अपने-अपने स्वजनों के यहां उपस्थित होते हैं और तृप्त होने पर आशीर्वाद प्रदान करते हैं। शास्त्र कहते हैं कि… श्राद्ध कर्म विधि

“पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः।
पितरि प्रीतिमापन्ने प्रीयन्ते सर्वदेवताः॥”

अर्थात् पिता ही धर्म है, पिता ही स्वर्ग है और पिता ही सब से बड़ा तप है। पितरों के प्रसन्न रहने से ही सारे देवता प्रसन्न होते हैं और तभी मनुष्य के सारे जप, तप, पूजा-पाठ, अनुष्ठान, मन्त्र साधना आदि सफल होते हैं। श्राद्ध कर्म विधि | श्राद्ध कर्म विधि

Also Read: आश्विन मास में ही क्यों मनाते हैं श्राद्ध? क्या है इसका कारण? श्राद्ध कर्म विधि

अन्न-जल पाने के लिए पितृ आश्विन मास के कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अमावस्या के दिन तक अपने पुत्र-पौत्रों के घर के दरवाजे पर आकर बैठ जाते हैं। यदि उस दिन तक उन्हें तृप्त नहीं किया जाता है, तो वे आशीर्वाद की जगह श्राप देते हैं, जो “पितृदोष” का कारण बनता है। पितृदोष के कारण व्यक्ति की प्रगति रुक जाती है और वह जीवन भर दु:खी एवं अभावग्रस्त रहता है। इसलिए शास्त्रोक्त विधि से पितरों के निमित्त दान आदि करना चाहिए ताकि वे प्रसन्न होकर हमें आशीर्वाद दें और साथ ही उनको मुक्ति भी मिले। श्राद्ध कर्म विधि

पितरों को प्रसन्न करने के लिए दक्षिण दिशा की ओर पितरों को याद करके दान दें। इससे कुंडली में विद्यमान पितृदोष का निवारण होता है। श्राद्ध कर्म विधि के तहत श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को भोजन भी कराना चाहिए, वस्त्र, दक्षिणा सहित वह सभी वस्तुएं भी दान देनी चाहिए, जो पितरों को प्रिय थीं। श्राद्ध कर्म विधि | श्राद्ध कर्म विधि

श्राद्ध कर्म विधि | श्राद्ध दान की 10 वस्तुएं | श्राद्ध कर्म विधि

श्राद्ध कर्म में 10 वस्तुएं महादान के अंतर्गत मानी गई हैं। जैसे, गौदान, भूमिदान, तिलदान, स्वर्णदान, घृतदान, वस्त्रदान, धान्यदान, गुड़दान, रजतदान, लवण दान। इन दस वस्तुओं का दान करने से पितृगण श्राद्धकर्ता से अत्यन्त संतुष्ट होते हैं। श्राद्ध कर्म विधि

Also Read: पितरों के श्राद्ध में इन तीन चीज़ों का रखें विशेष ध्यान! श्राद्ध कर्म विधि

श्राद्ध विधि-विधान

साधारण गृहस्थ श्राद्ध कर्म की विधि अनुसार तीन प्रमुख कार्य कर पितरों को संतुष्ट कर सकते हैं। पहला पिंडदान, दूसरा तर्पण और तीसरा ब्राह्मण भोजन। सुबह उठकर स्नान कर देव स्थान व पितृस्थान को गाय के गोबर से लीपकर गंगाजल से पवित्र करें। महिलाएं शुद्ध होकर पितरों के लिए भोजन बनाएं। दक्षिणमुख होकर आचमन एवं मार्जन (जल को छिड़कना) कर जनेउ को दांएं कंधे पर रखकर चावल (भात), गाय का दूध, घी, शक्कर एवं शहद को मिलाकर बने पिंडों को श्रद्धाभाव के साथ अपने पितरों को अर्पित करना चाहिए। जल में काले तिल, जौ, कुश, सफेद फूल मिलाकर उस जल से विधिपूर्वक तर्पण करें। श्राद्ध के अधिकारी श्रेष्ठ ब्राह्मण तथा कुल के अधिकारी जैसे जमाई, भतीजे आदि को न्यौता देकर बुलाएं। पितरों के निमित्त अग्नि में गाय का दूध, दही, घी एवं खीर अर्पित करें। गाय, कुत्ता, कौआ व अतिथि के लिए भोजन से चार ग्रास निकालें। ब्राह्मणों को आदरपूर्वक भोजन कराएं, वस्त्र, दक्षिणा आदि से सम्मान कर आशीर्वाद प्राप्त करें। श्राद्ध कर्म विधि

Image: Dawn. श्राद्ध कर्म विधि

Reply