श्राद्ध के नियम जिनका पालन अनिवार्य है पितरों को खुश रखने के लिए | पितृ पक्ष 2018

श्राद्ध के नियम – पितरों को खुश करने के लिए रीति अनुसार करें श्राद्ध!

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कृष्णपक्ष प्रतिपदा से अमावस्या तक पितृगण पृथ्वी लोक पर अपने गोत्र परिवार में अनेक रूप से विचरण करते हुए अपने स्वजनों से श्राद्धांत की अभिलाषा करते हैं। इसलिए भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण, पिंडदान आदि करने का विधान है। श्राद्ध कर्म की आवश्यकता के संबंध में शास्त्रों में बहुधा प्रमाण मिलते हैं। ब्रह्मपुराण के अनुसार श्राद्ध न करने से पितृगणों को दुख तो होता ही है, साथ ही श्राद्ध न करने वालों को भी अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है। श्राद्ध के नियम

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“श्राद्धं न कुरुते मोहात तस्य रक्तं पिबन्ति ते। पितृस्तस्य शापं दत्वा प्रदान्तिच।।” अर्थात् जो व्यक्ति पूर्वजों का श्राद्ध नहीं करते हैं, पितृ उनका ही रक्तपान करके चल देते हैं। साथ ही श्राद्ध भाग न पाने पर पितृ श्राप देकर वापिस अपने लोक चले जाते हैं। वहीँ दूसरी तरफ, श्राद्ध से संतुष्ट होकर पितृगण श्राद्धकर्ता को आरोग्यता, संतति सुख, ऐश्वर्य मोक्ष आदि पाने का आशीर्वाद देते हैं। श्राद्ध करते समय पितरों के प्रति और श्राद्ध के कर्मकांडों के प्रति संवेदनशीलता आवश्यक है। इसलिए इसके नियमों का पूर्ण पालन अवश्य करें। श्राद्ध के नियम

श्राद्ध के नियम | सार तत्व ग्रहण करते हैं पितर | श्राद्ध के नियम

प्राय: लोग शंका करते हैं कि आखिर श्राद्ध की वस्तुएं पितरों तक पहुंचती कैसे हैं? इस शंका का समाधान यह है कि देवता और पितर स्थूल भोजन प्राप्त न कर केवल सार तत्व ही ग्रहण करते हैं। जिस प्रकार मनुष्यों का आहार अन्न है, पशुओं का आहार घास है, वैसे ही पितरों का आहार अन्न के सार तत्व हैं। पितरों के नाम, गोत्र तथा स्वधा शब्द के उच्चारण के साथ की गई अन्न, आहुति और ब्राह्मण भोज सूक्ष्म अंश में सूर्य लोक पहुंचते हैं और वहां से अभीष्ट पितरों के पास, वे जिस भी योनि में हों और जिस प्रकार के आहार के योग्य होते हैं, वैसे ही रूप में पहुंच कर उन्हें तृप्त करते हैं। श्राद्ध के नियम

श्राद्ध के नियम | श्राद्ध की मुख्य बातें | श्राद्ध के नियम

  • पितरों के निमित्त सारी क्रियाएं जनेऊ को दांएं कंधे पर रखकर, भावपूर्वक दक्षिण मुख होकर की जाती हैं। तर्पण काले तिल मिश्रित जल से किया जाता है। श्राद्ध के नियम
  • सात्विक श्राद्ध भोजन में चावल, दूध, शक्कर और घी से बने पदार्थ, गंगाजल, शहद और खीर पितरों के लिए परम तृप्तिकारी होते हैं। श्राद्ध के नियम
  • श्राद्ध भोजन की तीन-तीन आहुतियां, “आग्नेश कव्यवाहनाय स्वाहा। सोमाय पितृभते स्वाहा। और वैवस्वताय स्वाहा।” मंत्रों द्वारा दी जाती है। तदोपरांत ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। भोजन के उपरांत ब्राह्मण को दक्षिणा अवश्य देनी चाहिए। श्राद्ध के नियम
  • गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी और देवताओं के लिए भी भोजन का कुछ भाग निकालना चाहिए। श्राद्ध के नियम
  • यदि श्राद्धकर्ता ब्राह्मण को भोजन, दक्षिणादि देने में असमर्थ हैं, तो वह ब्राह्मण को कच्चा धान्य व मुठ्ठी भर तिल देकर भी श्राद्धकर्म कर सकता है। इसमें भी असमर्थता होने पर गाय को चारा खिलाकर व पूर्वजों को नमस्कार करके क्षमा याचना कर लें। श्राद्ध के नियम
  • श्राद्धकर्ता को श्राद्ध के दिन एक समय भोजन, भूमि शयन व ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। इस दिन दातुन करना, पान खाना, मैथुन, तेल, उबटन लगाना आदि वर्जित माना गया है। श्राद्ध के नियम
  • श्राद्ध भोजन में लाल व काले रंग के फूल, केवड़ा, बेलपत्र, उड़द, मसूर अरहर, गाजर, लौकी, बैंगन, शलगम, प्याज, हींग, लहसुन, जीरा, पीली सरसों आदि वस्तुओं का प्रयोग निषेध है। श्राद्ध के नियम

Image By: Paromita Deb Areng.

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