26 जनवरी, भारतीय गणतंत्र दिवस - इन 68 सालों में कसौटी पर कितने खरे उतरे हम?

भारतीय गणतंत्र दिवस – इन 68 सालों में उम्मीदों पर कितने खरे उतरे हम?

भारतीय गणतंत्र 68 साल का हो चुका है। इन 68 वर्षों में कुछ सकारात्मक चीजें हुई हैं, तो नकारात्मकता भी कम नहीं हैं। सकारात्मक बात यह रही कि इस दौरान हमारा संविधान अक्षुण्ण रहा। देश में लोकतंत्र मजबूत हुआ। आम जनता का संविधान में विश्वास बना हुआ है। हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हालांकि बीच-बीच में हमारी एकता को तोड़ने की कोशिशें हुई, लेकिन पूरा भारत एक है। चाहे वह कश्मीर में जारी अलगाववाद हो, या पूर्वोत्तर में जारी अलगाव की आवाजें, हमारे देश की सीमाएं अक्षुण्ण हैं। इन छह दशकों में देश को कई आंतरिक और बाहरी विपत्तियों से जूझना पड़ा। इस दौरान चार-चार युद्ध हुए, जिनका मुकाबला हमने संविधान और लोकतंत्र का पालन करते हुए किया।

दूसरी ओर हताशा और विफलताओं की सूची भी लंबी है। जो देश आठ से नौ फीसदी की आर्थिक विकास दर पर अपनी ही पीठ थपथपाते हुए नहीं थकता, उसी का एक आंकड़ा यह भी है कि देश की 80 फीसदी आबादी 30 रुपये से भी कम में गुजारा करती है! आजादी के समय देश में जितने गरीब थे, आज उससे कहीं अधिक लोग गरीबी की हालत में हैं। निरक्षरों की संख्या घटने के बजाय बढ़ती जा रही है। आजादी के 70 वर्षों और गणतंत्र कायम होने के 68 वर्षों के बाद भी हम अशिक्षा नहीं मिटा पाए, विस्थापन दूर नहीं कर पाए और आम जनता के जीवन से गरीबी का अंधियारा दूर नहीं कर पाए। आर्थिक उदारीकरण की नीति अपनाने के बाद गरीबी-अमीरी के बीच खाई भी और चौड़ी हुई है। जिस बढ़ती आर्थिक विकास दर की बात की जाती है, उसका फायदा थोड़े से लोगों को ही हुआ है। अधिकांश लोगों को उदारीकरण की नीतियों से कोई लाभ होता दिखाई नहीं देता। नतीजतन अधिकतर लोगों का जीवन स्तर सुधरने के बजाय गिरता गया है। महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे गणतंत्र की भावना का मजाक उड़ाते से लगते हैं और इन सबके बीच आम आदमी खुद को असहाय पाता है। चाहे वह महंगाई का हमला हो या आतंकवाद-अलगाववाद और माओवाद का – इसके निशाने पर साधारण आदमी ही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि के मुद्दे पर हमारा प्रदर्शन कभी गर्व करने लायक नहीं रहा। क्या उम्मीद करें कि गणतंत्र के इस पावन अवसर पर हम इन क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन का प्रण लेते हुए संविधान के सम्मान का हरसंभव प्रयास करेंगे?

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पिछले कुछ सालों में भ्रष्टाचार का जैसा भीषण रूप यहां देखने को मिला है, उसकी शायद ही कोई मिसाल हो। इसका कारण यह है कि हमने गणतंत्र को लागू तो कर दिया, मगर लोकतांत्रिक व्यवस्था के तीनों अंगों, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका, ने अपनी जिम्मेदारी सही ढंग से नहीं निभाई। लोकतंत्र का कोई भी अंग पारदर्शी नहीं है। जवाबदेही के अभाव में मूल्यों का क्षरण हुआ है। मीडिया ने भी पारदर्शिता और जवाबदेही छोड़ दी है। बाजार में सब बिक रहा है। ऐसी सरकारें भी आने लग गई हैं, जो विधायिका को खरीदने तक का उपक्रम कर गुजरती हैं। विधायिका में छोटे-छोटे समूह बन गए हैं, जो मलाईदार मंत्रालय के लिए कैसे-कैसे दबाव डालते हैं, उन पर से भी थोड़ा परदा उठ चुका है। परदा जितना उठा है, वह पूरी व्यवस्था को समझने के लिए काफी है। कानून के राज का आलम यह है कि यह है कि देश की अदालतों में लंबित मामलों की संख्या लगभग 3 करोड़ से भी अधिक है। कानून सबके लिए बराबर होने की बात आज किताबों में और भाषण देने भर को रह गई है। बड़ा आदमी जुर्म करके भी छूट जाता है। गवाह खरीद लिए जाते हैं और फाइलों से दस्तावेज गायब हो जाते हैं।

लोकतंत्र की एक और विफलता यह भी है कि भारत का जो पैसा बाहर जमा है, उसे देश के भ्रष्ट लोगों ने चुराकर विदेशों में जमा किया है। इन छह दशकों में समृद्धशाली वर्ग ने अर्थव्यवस्था को कितना खोखला कर दिया है, इसका पता इसी बात से चलता है कि काले धन के रूप में 500 से 1,400 अरब डॉलर विदेशी बैंकों में जमा हैं। स्विस बैंकों में भारत का जितना पैसा जमा है, उतना दुनिया के किसी और देश का नहीं। यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। हालांकि उस धन को देश में वापस लाने के भरपूर प्रयास किये जा रहे हैं।

अपने साठ दशक के गणतंत्र पर हमें गर्व होता है। हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं और इसी शक्ति के बूते अब तक बड़ी-बड़ी चुनौतियों का मुकाबला करने में सक्षम हुए हैं। विशाल जनसंख्या, सर्वाधिक युवा आबादी और आर्थिक ताकत के कारण हम आगामी महाशक्तियों में शुमार किए जाने लगे हैं। लेकिन लोकतंत्र के तहत जो राजनीतिक व्यवस्था हमने लागू कर रखी है, अब उसकी विसंगतियां भयावह रूप से सामने आ रही हैं। 26 जनवरी, 1950 के दिन जिस गणतांत्रिक व्यवस्था को हमने लागू किया था, उसका आधार संविधान था, जिसमें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच कार्य विभाजन था और सबको अपनी सीमाओं में रहकर काम करना था। इसके बावजूद भी कई बार न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच अधिकार और कर्तव्य को लेकर विवाद के कुछ मामले सामने आए हैं। आज स्थिति यह है कि जो काम सरकार को करना चाहिए, वो सुप्रीम कोर्ट को करना पड़ता है। संविधान के लिहाज से देखें, तो जो काम कार्यपालिका का है, उसे न्यायपालिका को नहीं करना चाहिए, लेकिन एक सच यह भी है कि जब लोकतंत्र का एक स्तंभ जब अपने कर्तव्य से विमुख हो जाए, तब किसी न किसी को तो सक्रिय होना ही पड़ता है। संविधान में स्पष्ट रूप से दोनों के अधिकार क्षेत्रों को परिभाषित और परिसीमित किया गया है। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में काम करें, तो कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। अभी तक जितनी भी स्थितियां आई हैं, उन सबका समाधान संविधान के भीतर ही हुआ है। हालांकि कुछ मामलों में ऐसा लगता है कि इनके बीच के विभाजन की सीमा रेखा स्पष्ट नहीं है, पर यह सामान्य बात है। संविधान के प्रति आस्था ही गणतंत्र को मजबूत करती है। शुक्र है कि अभी तक ऐसी कोई गंभीर परेशानी नहीं आई है कि इनके बीच के टकराव से कोई सांविधानिक संकट पैदा हुआ हो।

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गणतंत्र के 68 साल पूरे होने के बाद भी एक सबसे महत्वपूर्ण खामी यह नजर आती है कि बहुत से औपनिवेशिक कानून अब भी चल रहे हैं। विधि आयोग ने भी ऐसे बहुत से कानून रेखांकित किए हैं, जो अब बिलकुल निरर्थक हो चुके हैं। विधि आयोग ने इस बारे में सरकार के पास अपनी सिफारिशें भेजी हैं। उन सिफारिशों के अलावा भी बहुत सारे कानून हैं, जिन्हें निरस्त कर देना चाहिए। उदाहरण के लिए, पुलिस ऐक्ट 1861 का है, जो अभी तक चल रहा है। भारतीय दंड संहिता 19वीं सदी की बनाई हुई है, जो अभी तक चल रही है। ये सारे कानून औपनिवेशिक सत्ता ने इस देश पर राज करने और जनता को बलपूर्वक काबू में रखने के लिए बनाए थे। दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि ये कानून अभी तक कायम हैं। इसे दूर करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी मीडिया की है कि वह जनता को जागृत करने का काम करे, जिससे तबदीली आए।

इन सब खामियों के बावजूद हमें गणतंत्र के प्रति निराश नहीं होना चाहिए। उम्मीद करनी चाहिए कि देश की तमाम समस्याएं सुलझेंगी और हमारा यह मुल्क प्रगति करेगा। हम पूरी दुनिया में गणतंत्र का न सिर्फ सबसे बड़ा, बल्कि सबसे बेहतर उदाहरण भी साबित होकर दिखाएंगे। लेकिन इसके लिए जरूरी यह है कि हम खुद भी मौजूदा विसंगतियों को दूर करने का बीड़ा उठाएं।

Image Source: Pixabay.

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