Aakhir Bahu Bhi Toh Beti Hee Hai - तो फिर बेटी और बहू में इतना अंतर क्यों?

बेटी v/s बहू : ‘आख़िर बहू भी तो बेटी ही है’, तो फिर दोनों में इतना फर्क क्यों?

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“बेटी अब बस करो। देखो तुम्हारी मां तुम्हे देखकर कितनी परेशान हो रही है। तुम बिल्कुल चिंता मत करो। मैं तुम्हें बहू नहीं, बल्कि अपनी बेटी बनाकर घर ले जा रही हूं। मैं भी एक बेटी की मां हूं। तीन महीने पहले ही मैंने अपनी बेटी जूही को विदा किया है। बेटी विदा करने का दर्द क्या होता है, यह मैं अच्छी तरह से जानती हूं। मैं तो यह समझूंगी कि मैंने एक बेटी विदा की और दूसरी घर ले आई।” – अपनी सास की बात सुन कर अंजू का मन कुछ हल्का हो गया। वह यह सोचने लगी कितनी अच्छी सोच है उसकी सासू मां की।

शादी के बाद ससुराल में करवाचौथ का उसका पहला त्योहार था। उसकी सासू मां ने एक दिन पहले ही उसे हिदायत दे दी थी कि कल करवाचौथ है आैर कल बिना चंद्रमा को अर्घ्य दिए जल ग्रहण नहीं करना है। इस बात का वह विशेष ध्यान रखे।

वह सोच में पड़ गई कि कैसे इतना कठिन व्रत करेगी वह। आज तक तो उसने कोई व्रत ही नहीं रखा। उससे तो खाली पेट रहा ही नहीं जाता, सिर दर्द होने लगता है। यही सोचते-सोचते वह थकी-मांदी बिस्तर पर जाकर लेट गई। तभी दूसरे कमरे से सासू मां की आवाज सुनाई दी। वह मोबाइल पर अपनी बेटी जूही से बातें कर रही थीं, “बेटी कल करवाचौथ का व्रत है, परंतु तुम दूध, फल, मेवे वगैरह ले लेना, नहीं तो तुम्हारी तबियत खराब हो जाएगी। मैं जानती हूं तुम से खाली पेट नहीं रहा जाता। मन में बस भगवान के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए। अब समय काफी बदल गया है और समय के साथ बदलने में ही समझदारी है।”

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अपनी सास की बात सुनकर अंजू यह सोचने पर मजबूर हो गई कि इन सास लोगों की कथनी और करनी में इतना अंतर क्यूं है? दूसरों को दिखाने लिए तो ये लंबी-लंबी बातें करती है और मन में बहू और बेटी में इतना फर्क? समय चाहे कितना भी बदल जाए, परंतु सास लोगों की सोच शायद कभी नहीं बदल सकती। बहू कभी बेटी नहीं बन सकती। यही सोचते-सोचते अंजू की आँख लग गई।

दोस्तों, आज भी हमारे समाज में बहुओं और बेटियों में बहुत अंतर किया जाता है। ऐसा क्‍यूँ है? लोग ये क्यूँ भूल जाते हैं कि उनकी बहू भी किसी की घर की बेटी है और उनकी बेटी भी एक न एक दिन किसी घर की बहू बनेगी।

एक ही घर में बहुओं के लिए अलग कानून बनाये जाते हैं और बेटियों के लिए अलग?

बेटी अगर माँ को जवाब दे तो बोलते हैं कि अभी नासमझ है,
और वहीं अगर बहू कुछ कह दे तो बोलते हैं, क्या तुम्हारी माँ ने तुम्हें यही संस्कार दिए हैं कि तुम बड़ों को जवाब दो।

बेटी सुबह लेट सोकर उठे तो कोई बात नहीं,
और बहू अगर एक दिन लेट हो जाए तो सास का मुँह फूल जाता है।

बेटी घंटो फ़ोन पर बात करे तो कुछ नहीं, दिन हैं उसके,
और अगर बहू करे तो दस बातें सुनायी जाती हैं कि घर में और कोई काम नहीं है क्या?

बेटी खुलकर हंस सकती है, नाच सकती है, गा सकती है,
वही बहुओं को ऊँची आवाज में बात करना भी गलत माना जाता है।

बेटी घर में कुछ भी काम ना करे तो छोटी है अभी, सीख जाएगी,
और वहीं बहू पूरा दिन काम करे या अगर उससे कोई काम ना हो पाए या ग़लत हो जाए, तो बोला जाता है ‘इतनी बड़ी हो गयी, अभी तक काम करने का भी तरीका नहीं आया?’

घर मे जो बेटियां पहन सकतीं हैं, वो बहुएं नहीं,
उन्हें कहा जाता है कि बड़ों का लिहाज शरम है या नहीं, और बेटियों के लिए क्या बड़े आँखे बंद कर लेते हैं?

बेटी ससुराल में खुश होती है तो खुशी होती है,
और बहू ससुराल में खुश है तो खराब लगता है।

दामाद बेटी की मदद करे तो अच्छा लगता है,
और बेटा बहू की मदद करे तो जोरू का गुलाम कहा जाता है।

बेटी जींस पहने तो खुश होते हैं कि मॉडर्न फैमिली है,
और बहू सलवार सूट भी पहन ले तो बेशर्म लगती है।

बेटी को ससुराल में अकेले काम करना पड़े, तो चिंता होती है कि मेरी बेटी थक जायेगी,
और बहू सारा दिन अकेले काम करे, फिर भी बहू काम-चोर कहलाये।

बेटी की सास और ननद काम ना करें तो गुस्सा आता है,
और जब वो अपने घर में बहू की मदद ना करें तो वो सही लगता है।

बेटी की ससुराल वाले ताना मारें तो गुस्सा आता है
और खुद बहू के मायके वालों को ताना मारना सही लगता है।

बेटी को रानी बनाकर रखने वाली ससुराल चाहिए,
और खुद को बहू कामवाली चाहिए।

आजकल घर में बहुओं पर तरह-तरह के अत्याचार किये जाते हैं। उन्हें उनकी मर्जी से जीने का अधिकार तक नहीं दिया जाता। यहाँ तक कि कई बार तो दहेज़ के लालच में आकर उन्हें जान से मार भी दिया जाता है, जिसमें सास-ससुर से लेकर बेटा, बहन तक सब शामिल होते हैं। लोग कैसे भूल सकते हैं कि किसी दिन यही सब उनकी बहन या बेटियों के साथ होगा तो क्या वो बर्दाश्त कर पाएंगे? ससुराल में एक बेटी के दर्द को बिल्कुल सटीक शब्दों में बयान करती है ये कविता…

बेटी, बहू हिस्सा एक घर का,
फिर भी जुदा किस्सा है इनका।
एक पर जान, दूसरी पर इल्जाम,
येे किस्सा है हर घर का।

बेटी की आह पर मरते,
बहू की आह को तरसे,
इन किस्सों को हो गये अरसे,
काश, गुम हो जाएं ये किस्से हर घर से,
नामुमकिन है मिटना इनका,
बेटी, बहू हिस्सा एक घर का,
फिर भी जुदा किस्सा है इनका।

बेटी भी है बहू किसी की,
जल्लाद लगे तुम्हें सास उसी की,
खुद को तो तुम देवी मानो,
हँस के जलील बहू को करना जानो,
बहू के मुँह पर ताने मारो,
सामने हो बेटा तो गले लगा लो,
यही तो है सिक्का सीधोँ का,
बेटी, बहू हिस्सा एक घर का,
फिर भी जुदा किस्सा है इनका।

बेटी दे तो पानी भी अमृत,
बहू का अमृत भी है पानी,
ऐ दूजे घर जाने वाली,
तेरी हरदम यही कहानी,
तू हँस के बोलेगी भी तो,
तेरी तो होगी बदनामी,
सास तो माँ है, तू ना बेटी,
यही तो सच है इस जग भर का,
बेटी, बहू हिस्सा एक घर का,
फिर भी जुदा किस्सा है इनका।

क्या हर घर में बहुओं और बेटियों को प्यार, सम्मान और अधिकार नहीं मिलना चाहिए? ताकि हर माँ बाप ये कह सकें कि हमने बेटी करके कोई गलती नहीं की। हर माँ बाप बेटी को विदा करने के बाद चैन की सांस ले सकें, ये सोचकर कि जितने नाजों से उन्होंने अपनी फूल सी बेटी को पाला, उतने ही नाजों से बहू के रूप में ससुराल वाले उसे वही प्यार और सम्मान देंगे।

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एक बात समझ नहीं आयी मेरे यार, एक बार ज़रा समझाना,
क्यों इतनी ज़ालिम है ये दुनिया, क्यों मतलबी है ये ज़माना।

कहते हैं बहू को बेटी समान,
पर बेटी जैसा ना दिया, उसकी बातों को कोई मान।

रोज़ करेंगी बातें, रोज़ है अपनी बेटी से मिलना बतलाना,
पर ना करे बात बहू किसी से, क्या होगा मिलके मायके वालों से, ये है उनका सुनाना।

क्या ये बात समझ में नहीं आती कि उसे भी प्यार है अपनों से,
क्यूं इतनी सी बात मुश्किल है समझाना,
कहने की ये बात नहीं है, बस इस बात को खुद को है अपनाना।

रोज़ जो आती बेटी घर पर, सत्कार खूब है करना,
फिर क्यूं जब आये बहू पीहर से, खूब उसे है धिक्कारना।

खिल-खिलाते जब देखे वो, माँ-बाप का प्यार बरसाना,
फिर क्यूं याद ना आये उसे भी, अपनों के संग वो मुस्कुराना।
क्यूं इज़ाज़त लेनी पड़ती है, फिर ना सुन कर सिर झुकाना,
बस क्यूं ना कह दें हम भी, हमें भी है मिलना मिलाना।

तुम भी तो हो बेटी किसी की, तुम्हारी भी है बेटी बहना,
फिर बस क्यूं ये कहना,
अभी तो मिली थी, क्या होगा मिल के, क्यूं ढूंढ़ रही हो ना करने का बहाना।

सच कहने की कोई बात नहीं है, सच छुपाने के भी हालात नहीं हैं,
फिर क्यूं ये आँख मिचौली का खेल, फिर क्या हर बात पर टोक लगाना।
एक बार में हाँ बोल दो अगर, क्या तुम घट जाओगी ये बताना,
झूठ से सौ गुना सच पसंद है, एक बार तो कह के बताना।

क्यूं मुश्किल है इतना, बहू से प्यार जताना,
एक बात समझ नहीं आयी मेरे यार, एक बार ज़रा समझाना।

लोग यह क्यूं भूल जाते है कि बहू भी किसी की बेटी है। वो भी तो अपने माता-पिता, भाई-बहन, शहर-सहेली आदि को छोड़कर आपके साथ नये जीवन की शुरुआत करने आई है। जो लोग भी यह पोस्ट पढ़ रहे हैं, वो कोशिश करें कि बहू और बेटी में कभी फर्क ना करें। तभी यह दुनिया बदलेगी, समाज बदलेगा और आपकी बेटियां भी ससुराल में आनंद से रहेगीं। मत भूलिए कि आपकी बहू किसी की बेटी और आपकी बेटी भी किसी की बहू है

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  1. Amit

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