Information About Mahashivratri Festival in Hindi - महाशिवरात्रि का महत्व

मोक्ष्‍ा की महारात्रि है शिवरात्रि – जानिए क्या महत्व है महाशिवरात्रि में भगवान शिव की पूजा का!

तीन लोकों के स्वामी और देवाधिदेव महादेव सर्वशक्तिमान और कल्याणकारी देव हैं। संपूर्ण शरीर पर भभूत, भाल पर अर्ध चंद्र, गले में सर्पों की माला, जटाओं में गंगा, हाथ में त्रिशूल एवं डमरू, और बाईं ओर विराजमान जगत जननी माता पार्वती। महादेवजी का यह अद्भुत स्वरूप उन्हें पूर्णता प्रदान करने वाला है। वैसे तो हर मास की सारी शिवरात्रि कल्याणकारी हैं, लेकिन फाल्‍गुन मास की महाशिवरात्रि का अपना एक विशेष ही महत्व है। कहते हैं कि कल्याण और मोक्ष प्रदान करने वाली महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की विधि-विधान के साथ्‍ा पूजा करने से जीवन में सुख, शांति और खुशहाली आती है।

शिव क्यों हैं पूज्य?

महादेवजी की साकार और निराकार, दोनों ही रूपों में पूजा की जाती है। शिव की पूजा में शिवलिंग के पूजन का विशेष महत्व माना गया है, जिसका अर्थ है कि प्रकृति समस्त योनियों का समष्टि रूप है। मानवता का कल्याण करने की कामना रखने वाले भगवान शंकर ने समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष का सेवन करके संपूर्ण चराचर जगत को यह संदेश दिया कि वे काल के देवता भी हैं। अन्याय और अत्याचार का पर्याय बने तारकासुर के वध का निमित्त बने भगवान शिव ने माता सती के अपने पिता के घर यज्ञाग्नि में भस्म होने के बाद तांडव नृत्य करके समस्त लोकों में अपनी संहार शक्ति का परिचय भी दिया। ऐसी ही बहुत सारी अद्भुत शक्तियों के स्वामी भगवान शिव से जुड़ा है महाशिवरात्रि का यह पावन पर्व। महाशिवरात्रि काल की अभिव्यक्ति देने वाली एकमात्र ऐसी कालरात्रि है, जो मनुष्यों को पापकर्म, अन्याय और अनाचार से दूर रहकर पवित्र एवं सात्विक जीवन जीने की प्रेरणा देती है। इसलिए महाशिवरात्रि को कल्याण और मोक्ष प्रदान करने वाली माना गया है।

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श्रद्धाभाव से करें शिव पूजन…

भगवान शिव का पूजन श्रद्धाभाव के साथ करने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके ‘ॐ नमः शिवाय’ का उच्चारण करते हुए शिवलिंग पर गंगाजल, गौदुग्ध, दही, घृत, शहद, पंचामृत आदि से अभिषेक करना चाहिए तथा चंदन, बूरा, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, पंचमेवा, फल, धतूरा, रुद्राक्ष, बेलपत्र, पुष्पों में कनेर, नीलकमल, गुलाब, चमेली, गेंदा आदि अर्पित करने के साथ-साथ धूप और दीप प्रज्‍ज्वलित करना चाहिए। ध्यान रहे, शिवलिंग पर कभी भी चंपा, केतकी, नागकेशर, केवड़ा और मालती के पुष्प नहीं चढ़ाने चाहिए।

पढ़ें शिव-सती का प्रसंग…

महाशिवरात्रि की रात्रि में जागरण करते हुए शिव जी की आराधना करने और शांत-चित्त एवं पूर्ण सात्विक भाव से व्रत रखने से भक्तों के समस्त दुःख तथा कष्ट दूर हो जाते हैं। शिव पूजन के दौरान महामृत्युंजय मंत्र, शिवाष्टक, रुद्राष्टक, रामचरितमानस के बालकांड के अंतर्गत ‘शिव-सती प्रसंग’ का पाठ करना विशेष फलदायी माना गया है। व्रत न भी कर सके, तो उक्त पाठ से भी शिव उपासना का संपूर्ण फल मिल जाता है।

शिवजी का उपदेश…

एक बार पार्वती जी भगवान शंकर जी के साथ सत्संग कर रही थीं। उन्होंने भगवान भोलेनाथ से पूछा, गृहस्थ लोगों का कल्याण किस तरह हो सकता है? शंकर जी ने बताया, सच बोलना, सभी प्राणियों पर दया करना, मन एवं इंद्रियों पर संयम रखना तथा सामर्थ्य के अनुसार सेवा-परोपकार करना कल्याण के साधन हैं। जो व्यक्ति अपने माता-पिता एवं बुजुर्गों की सेवा करता है, जो शील एवं सदाचार से संपन्न है, जो अतिथियों की सेवा को तत्पर रहता है, जो क्षमाशील है और जिसने धर्मपूर्वक धन का उपार्जन किया है, ऐसे गृहस्थ पर सभी देवता, ऋषि एवं महर्षि प्रसन्न रहते हैं।

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भगवान शिव ने आगे उन्हें बताया, जो दूसरों के धन पर लालच नहीं रखता, जो पराई स्त्री को वासना की नजर से नहीं देखता, जो झूठ नहीं बोलता, जो किसी की निंदा-चुगली नहीं करता और सबके प्रति मैत्री और दया भाव रखता है, जो सौम्य वाणी बोलता है और स्वेच्छाचार से दूर रहता है, ऐसा आदर्श व्यक्ति स्वर्गगामी होता है। भगवान शिव ने माता पार्वती को आगे बताया कि मनुष्य को जीवन में सदा शुभ कर्म ही करते रहना चाहिए। शुभ कर्मों का शुभ फल प्राप्त होता है और शुभ प्रारब्ध बनता है। मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही प्रारब्ध बनता है। प्रारब्ध अत्यंत बलवान होता है, उसी के अनुसार जीव भोग करता है। प्राणी भले ही प्रमाद में पड़कर सो जाए, परंतु उसका प्रारब्ध सदैव जागता रहता है। इसलिए मनुष्य को हमेशा सत्कर्म करते रहना चाहिए।

Image Credit: Flicker/Natesh Ramasamy.

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