Parenting: Child Care Tips for Parents in Hindi

कहीं खो न जाए मासूमियत – Child Education Tips for Parents

बचपन एक ऐसी उम्र होती है, जिसमें बिना किसी तनाव के मस्ती से जिंदगी का आनंद लिया जाता है। सच कहें तो बचपन ही वह वक्त होता है, जब हम दुनियादारी के झमेलों से दूर अपनी ही मस्ती में मस्त रहते हैं। पर क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि आज के बच्चों का बेखौफ बचपन कहीं खो गया है? आज मुस्कुराहट के बजाय इनके नन्हे चेहरों पर उदासी व तनाव की लकीरें क्यों दिखने लगी हैं? अपनी छोटी-सी उम्र में नानी व दादी की कहानी सुनने वाले बच्चे आज पहले से कहीं ज्यादा व्यस्त हो गए हैं। नाजुक कंधों पर भारी बस्ता टांगे, उनके कदम प्रतिस्पर्धा की दौड़ में शामिल हो रहे हैं। एक वक़्त था जब नन्हे होठों पर फूलों-सी खिलती हंसी व शरारतें उनकी मुख्य पहचान हुआ करती थीं, मगर आज उन पर पेरेंट्स की अपेक्षाएं ज्यादा हावी हैं। नन्हे बच्चों पर पहले से ही पढ़ाई का बहुत तनाव रहता है, ऊपर से कॉम्पीटिशन में जीत का दबाव इन बच्चों को कम उम्र में ही बड़ा व गंभीर बना देता है। शायद यही वजह है कि वे कम उम्र में ही तनाव के शिकार होने लगे हैं।

गुरुकुल वह स्थान हुआ करता था, जहां छात्र विद्याध्ययन के लिए गुरु के साथ रहा करते थे। जितने वर्षों तक वे गुरु के साथ रहते थे, उससे उनके जीवन तथा विचारों को परिवर्तित करने के लिए पर्याप्त अवसर प्राप्त होते थे तथा समय भी काफी मिला करता था। विद्याध्ययन के उस काल में कोई छात्र उर्त्तीण या अनुर्त्तीण नहीं होता था। छात्र का आकलन और निरीक्षण गुरु द्वारा प्रतिक्षण होता रहता था और उसका परीक्षण तब होता था, जब वह छात्र समाज में जाकर अपने व्यवहार तथा योग्यता का प्रदर्शन करता था। गुरुकुल से ज्ञानकुल की इस यात्रा में छात्र अपने अध्यापकों से संपर्क तोड़ चुका है। आज का छात्र समाज में बिखरे ज्ञान को समेटने की प्रक्रिया में अपने आसपास फैले ज्ञान के भंडार में खुद को फंसा हुआ पाता है। यही कारण है कि ये सूचनाएं उसका लाभ कम और हानि अधिक कर रही हैं।

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CCE (Continuous and Comprehensive Evaluation – सतत और व्यापक मूल्यांकन) एक प्राचीन आकलन की प्रक्रिया है, जिसे नए आवरण में सजा कर और आकर्षक बनाकर शिक्षाविदों द्वारा परोसा जा रहा है। अभिभावक होने के नाते अब यह आपका उत्तरदायित्व है कि आप कितनी सजगता के साथ इस स्थिति को संभालते हैं क्योंकि सतर्कता से ही बच्चों को इस बुरे प्रभाव से बचाया जा सकता है। बेहतर होगा यदि एक छात्र का आकलन अध्यापन को रुचिकर तथा प्रभावशाली बनाने के लिए किया जाए, ताकि वह अपने लक्ष्य से भटके नहीं।

विद्यार्थी पठन-पाठन के दौरान ज्ञान के विभिन्न स्रोतों से जुड़ा रहता है। ऐसे में अभिभावकों के लिए आवश्यक हो जाता है कि वे बच्चों को महत्वपूर्ण सहायता उपलब्ध कराएं ताकि वे अपना ध्यान केवल विद्या प्राप्ति में लगा सकें। तैयारी सिर्फ एग्जाम के लिए ही नहीं, बल्कि सही शिक्षा प्राप्त करने के लिए भी होनी चाहिए। एक छात्र अपने आप को ज्ञानवृक्ष के एक मजबूत तने के रूप में तैयार करता है। इसलिए ज़रूरी है कि उसका शारीरिक और मानसिक विकास इस तरह से हो कि वह उच्चतर कक्षाओं के स्तर को ग्रहण करने में समर्थ हो और ज्ञानवृक्ष के फल को पचा सके। यह हम सभी जानते हैं कि बच्चों की प्रथम पाठशाला उसका घर होता है। इसलिए किसी बच्चे के लिए सिर्फ स्कूल में ही पढ़ाई काफी नहीं है। घर का माहौल भी उसके अनुरूप बनाना होता है। घर वालों के सहयोग से ही वह अपना सपना पूरा कर सकता है, यह बात हमें कभी नहीं भूलनी चाहिए।

अभिभावकों के लिए: जरूरी है आपका सहयोग

  • अभिभावक अपने अनुभव से बेहतर जानते हैं कि कैसे तैयार किए गए लम्बे पाठों को शॉर्ट नोट्स बनाकर रिवाइज किया जा सकता है। इसलिए बच्चों को प्वाइंट बनाकर याद करने में मदद करें।
  • लगातार पढ़ते रहने से बच्चे का दिमाग थक जाता है, इसलिए बीच-बीच में उसे थोड़ी देर का ब्रेक लेने दें।
  • अगर शुरू से ही बच्चों में नियमित पढ़ने की आदत डाली जाए, तो परीक्षा के समय उन पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ता और वे अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेते हैं। इसलिए अपने बच्चे को शुरू से नियमित पढ़ने का अभ्यास डालें, ताकि परीक्षा के समय उस पर अनावश्यक तनाव न हो।
  • जहां तक हो सके वातावरण को सहज और आरामदेह बनाए रखने में मदद करें। हर ब्रेक के बीच हंसी का रिलैक्स माहौल बनाएं।
  • हमेशा याद रखें कि हर बच्चा दूसरे से अलग है। उसकी प्राथमिकताएं और अपेक्षाएं दोनों अलग हो सकती हैं और उसके पढ़ने का अंदाज भी भिन्न हो सकता है। यहाँ तक कि याद करने के तरीके में भी फर्क हो सकता है। इसलिए उसे समझें और जिस तरीके में उसे आनंद आता है और वह सहज महसूस करता है, उसे उसी तरीके से पढ़ने दें।
  • बच्चे को पढ़ने के लिए उत्साहित करिए और समय-समय पर टीचर से संपर्क करते रहिए, जिससे आपको बच्चे की सही रिपोर्ट मिलती रहे।
  • बच्चे की कमजोरी को समझने की कोशिश करें और उसे टीचर के सहयोग से सुलझाएं। किसी सब्जेक्ट में कमजोर होने पर यदि उसे सहायता चाहिए तो उसे अवश्य दिलाएं।
  • परीक्षा से तीन से चार सप्ताह पहले विषय की तैयार पूरी हो जानी चाहिए, जिससे बाद के दिनों में केवल रिवीजन का काम बचे।
  • पिछली परीक्षाओं के पेपर परीक्षा की तैयारी में मददगार होते हैं, उनकी सहायता अपने बच्चे को अवश्य दें।
  • बच्चों की उचित डाइट पर भी ध्यान दें। पढ़ाई के बीच में जो भी खाने की चीज़ें दें, वे हेल्दी व पौष्टिक होने चाहिए। उनके पोषण का पूरा ख्याल रखें।

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बच्चों के लिए: संयम बनाए रखें

  • अंतिम क्षणों का इंतजार किए बिना पहले दिन से अपनी तैयारी सही रखिए।
  • पढ़ने की सारी सामग्री व्यवस्थित करके रखिए, ताकि पढ़ते समय इधर-उधर भटकना न पड़े।
  • आप जिस विषय की तैयारी कर रहे हैं, उसके आधार को ध्यान में रखकर पढ़ाई करें। जैसे कि किसी विषय की तैयारी करते समय आपको पता होना चाहिए कि आपको एक लाइन में उत्तर देना है या व्याख्या करनी है।
  • परीक्षा के दौरान अगर दिल की धड़कन तेज हो रही है या हथेलियों से पसीना निकल रहा है, तो सारी चिंता छोड़कर शांत होने की कोशिश कीजिए। खराब से खराब क्या हो सकता है, उसके लिए अपने मन को तैयार कर लें। थोड़ी ही देर में आपका सारा डर गायब हो जाएगा।
  • परफेक्शन की उम्मीद मत रखें, लेकिन कोशिश में कमी भी न रहने दें। इस सोच के साथ अगर आप तैयारी करेंगे, तो आप बेहतर कर पाएंगे।

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Image: ligneparents.

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