मंथन: आखिर कब रुकेंगी बलात्कार की घटनाएं? Stop Rapes in India Now!

कई बार अखबार पढ़कर, टीवी देखकर या नेट सर्फिंग से लगता है जैसे कि बलात्कार की बाढ़ आ गई है। हर दूसरी खबर ऐसी ही है। ऐसा क्यों हो रहा है? लड़कियों की रक्षा के लिए पुलिस है, महिला पुलिस है, राष्ट्रीय महिला आयोग से लेकर राज्यों के महिला आयोग हैं, महिलाओं के लिए काम करने वाले संगठन हैं, एनजीओज हैं, महिला विकास और बाल कल्याण मंत्रालय है, महिलाओं की मदद करने के लिए तरह-तरह के कानून हैं, मगर उनके प्रति अपराध फिर भी नहीं थम रहे हैं। हर बार जब कोई ऐसी घटना होती है, तो कहा जाता है कि कानून लचर है। कुछ लोग तो यह सलाह भी देते हैं कि बलात्कारियों को चौराहे पर फांसी पर लटकाया जाए। लेकिन एक सच यह भी है कि छोटे शहरों और गावों में महिलाओं को कानूनों की इतनी जानकारी नहीं होती।

आखिर क्यों नहीं रुक रहे बलात्कार?

आज बलात्कार के मामले में बेहद कठोर कानून हैं, फिर भी क्या वजह है कि बलात्कार नहीं रूक रहे हैं? बलात्कार स्त्री के प्रति किया गया सबसे घृणास्पद अपराध है। इसके बीज हमारी उस संस्कृति में छिपे हैं, जहाँ एक तरफ स्त्री को देवी कहा जाता है, मगर दूसरी तरफ उसे हमेशा ही एक सेक्स ऑब्जेक्ट की तरह देखा जाता है और उसे पुरुष के उपभोग और उपयोग की चीज़ समझा जाता है। क्या हम यह मानें कि बलात्कार बढ़ते ही जा रहे हैं या यह कहें कि आजकल ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग बहुत बढ़ी है। अगर दिल्ली पुलिस की मानें तो दस में चार केस झूठे होते हैं। इनका कारण किसी से बदला लेना, लिव इन में रहने के बाद शादी की बात न बनना, जमीन जायदाद का मामला, सास-ससुर से अलग रहने के लिए ससुराल वालों पर बलात्कार का आरोप मढ़ देना, आदि मामले शामिल हैं। निर्भया कांड के बाद मशहूर फेमिनिस्ट मधु किश्वर का कहना था कि कड़े कानून से पीड़िता को न्याय मिले या न मिले, बलात्कार के मामले में हमेशा पुलिस की जेब ही ज़्यादा भरती है। यानी कि पुलिस भी कई बार झूठे मामले में फंसाने के लिए इस कानून का इस्तेमाल कर सकती है। वैसे भी जांच एजेंसियों की भूमिका अक्सर संदेह की नजर से देखी जाती है।

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पॉर्न का बाज़ार भी है जिम्मेदार…

इन दिनों पॉर्न को ‘पर्सनल चॉइस’ का मामला कहा जाता है। जबकि विशेषज्ञ बताते हैं कि पॉर्न साइट्स और स्त्रियों-बच्चों के मामले में होने वाले यौन अपराधों के बीच गहरा रिश्ता है। पॉर्न का व्यापार पूरी दुनिया में अरबों डॉलर का है। यही नहीं, देखने में आता है कि चाहे टीवी पर दिखाए जाने वाले विज्ञापन हों, फिल्में हों, सब में सेक्स दिखाया जाना जरूरी माना जाता है। प्रिंट मीडिया को अपना सर्कुलेशन बढ़ाने के लिए, उद्योग को अपना सामान बेचने के लिए, चैनल्स को अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए, जिससे कि विज्ञापनों से उनकी झोली भर सके और भारी मुनाफा कमाया जा सके, स्त्री छवियों को सेन्सुअल और सेक्सी अवतार में ही दिखाया जाना जरूरी लगता है। इसलिए चाहे घड़ी, शैम्पू का विज्ञापन हो, परफ्यूम, साइकिल और कार का, बनियान, घर, आइसक्रीम, सभी में स्त्रियों को पुरुषों की वासना पूरी करने वाली वस्तु के रूप में दिखाया जाता है। जब स्त्री सिर्फ सेक्स और पुरुष की इच्छाएं पूरी करने का ही साधन है, तो हर कोई उसे पाने की कोशिश करेगा, चाहे इसके लिए उसे बलात्कार का ही सहारा क्यों न लेना पड़े। फिर एक बात यह भी है कि यदि बार-बार औरत को उसकी योग्यता के मुकाबले एक शरीर के रूप में पेश किया जाएगा तो निश्चित तौर पर औरत के प्रति अपराध को बढ़ावा तो मिलेगा ही।

खुली हैं राहें, फिर भी टूट रही उम्मीद…

हालांकि जानकारी बढ़ रही है। एक अच्छी बात यह हुई है कि अब माता-पिता भी लड़की को यह शिक्षा नहीं देते कि वह अब किसी भी अपराध को छिपाए, इसलिए वे अपनी लड़की का साथ देते हैं। आगे बढ़कर पुलिस में शिकायत करते हैं। पहले लड़की की तथाकथित इज्जत जाने के डर से माता-पिता लड़की को चुप रहने और अपने प्रति किए गए अपराध को छिपाने की सलाह देते थे। पहले समाज का नजरिया भी ऐसा था कि लड़की ने अपराध नहीं किया है, फिर भी उसे अपराधी मान लिया जाता था और अपराध करने वाले छुट्टा घूमते थे। दिल्ली के निर्भया कांड के बाद उम्मीद थी कि लड़कियों के प्रति अपराध में कुछ कमी आएगी, कठोर कानून के डर से लोग लड़कियों के प्रति अपराध करने से बचेंगे, मगर ऐसा हुआ नहीं। हर दूसरी खबर ऐसी ही है। ऐसा क्यों हो रहा है? हालांकि अब भी बलात्कार की शिकार हुई कुछ लड़कियां समाज का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं और आत्महत्या करने की कोशिश करती हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान और अन्य राज्यों में भी इस तरह की काफी घटनाएं हो चुकी हैं।

तो कैसे पाई जाए इस बलात्कार रुपी दानव पर विजय?

पहली जरूरत नजरिया बदलने की…

पहली ज़रूरत तो यह है कि शिक्षक, समाजसेवी, मीडिया, और नेता लोगों का नजरिया बदलने की कोशिश करें। यदि किसी लड़की के साथ कोई अत्याचार हो, तो लोग उसे ही दोषी न ठहराने लगें। उसी से सवाल न पूछे जाएं कि वह अकेली क्यों गई थी? किसी लड़के के साथ उसका क्या काम था? लड़कियां यदि सीमा में नहीं रहेंगी तो उनके साथ ऐसे हादसे तो होंगे ही! इन विचारों से तो यही पता चलता है कि लड़कियां चाहे जितनी भी पढ़-लिख जाएं, अपने पैरों पर खड़ी हो जाएं, लोग उनसे ही सवाल पूछेंगे। लड़कियों को अक्सर नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले उन्हें सताने वालों से आखिर कोई सवाल क्यों नहीं पूछते?

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संस्कारों में शामिल हो औरतों का सम्मान…

यूं तो हमारे देश में औरत को पूजनीय माना जाता है, लेकिन उसका जितना अपमान कदम-कदम पर भारतीय परिवारों में होता है, उतना ही शायद कहीं और होगा। आप कह सकते हैं कि आजकल ऐसा नहीं है। लड़कियां कहीं पीछे नहीं हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों को पिछड़े मानकर छोड़ भी दें तो आज भी कई शहरी परिवारों तक में मासिक धर्म के समय स्त्रियों को अछूत मानकर उनके साथ अलग व्यवहार किया जाता है।

मजाक न बने सेक्स एज्युकेशन…

खासकर भारत में सेक्स एज्युकेशन को मजाक बनाकर रख दिया गया है। यह बायोलॉजी पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए कुछ पन्नों में सिमट कर रह गई है, जबकि बदलते परिवेश में यह टीनरेप को रोकने में बहुत बड़ी मदद कर सकती है। भारतीय परिवारों का माहौल कुछ ऐसा है कि वहां सेक्स पर बात किसी पाप से कम नहीं माना जाता। ऐसे में कच्ची उम्र के बच्चों के दिमाग में सेक्स को लेकर पनपी जिज्ञासा और अधकचरी जानकारी उन्हें सेक्स संबंधी अपराधों को और धकेलती है। यहां यह भी गौर करने लायक है कि एचआईवी से पीड़ित मरीजों में 34 फीसदी मरीज 12 से 19 साल तक होते हैं। हालांकि कुछ स्कूलों ने शरीर में होने वाले परिवर्तन, मासिक धर्म की वजह से होने वाली समस्याओं जैसी चीजों पर वर्कशॉप्स आरंभ की हैं, लेकिन ये कुछेक इने-गिने स्कूलों तक ही सीमित हो कर रह गई हैं।

Image Courtesy: News18.

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