Emotional Story of Father and Son in Hindi - ये कैसा कर्तव्य-बोध? | Krisuman

ये कैसा कर्तव्य-बोध? – A Heart Touching Story of a Father and His Son!

बेटे की नौकरी एक बड़ी कंपनी में लग गई थी। उसने अपने मम्मा-पापा से कहा, ‘मैं मुंबई शिफ्ट हो रहा हूं। अब आप लोग गांव वाले मकान में जाकर रहें। मेरे साथ कहां भटकते फिरेंगे। बुढ़ापे में सुकून भरी जिंदगी गुजारिए। अब आप मेरे प्रति अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हैं।’ मम्मी-पापा जान चुके थे कि बेटे पर आधुनिकता और पाश्चात्य सभ्यता का रंग चढ़ा हुआ है। अपने आगे वह किसी की भी नहीं सुनेगा, फिर भी उन्होंने याचना करते हुए कहा, ‘परंतुु बेटे, तुम्‍हारे सिवा हमारा कोई नहीं है। हम अकेले गांव में कैसे रहेंगे? हमारी देखभाल…’

‘अकेले कहां…आप दोनों तो हैं साथ में। फिर मैं तो नौकरी में व्यस्त रहूंगा, ऐसे में आप लोगों पर ध्यान कहां दे पाऊंगा?’ बेटे ने अपना पक्ष रखते हुए कहा। बेटा मुंबई चला गया और मम्मी-पापा गांव के पुश्तैनी मकान में।

समय बीता। लड़के ने वहीं एक लड़की से प्रेम विवाह कर लिया। वह भी एक मल्टी-नेशनल कंपनी में नौकरी करती थी। सब कुछ ठीक चल रहा था कि बीवी प्रेग्‍नेंट हो गई। उसने काम पर जाना बंद कर दिया था, परंतु घर पर उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था। प्रेग्‍नेंट बीवी करती भी तो क्या-क्या करती? प्रेम विवाह करने के कारण पत्नी के घर वाले नाराज थे। खबर मिलने पर भी कोई नहीं आया। पति घर का काम करता, पत्नी को संभालता या नौकरी देखता? शादी के बाद पहली बार जीवन में उसे परेशानी का सामना करना पड़ा था। पति-पत्नी दोनों परेशान हो गए। अंत में दोनों ने सोच-विचार कर एक निर्णय लिया और पति ने अपने मम्मी-पापा को पत्र लिखा,

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“प्रिय मम्मी-पापा, मुझे बहुत अफसोस है कि बुढ़ापे में मैंने आपको गांव में अकेला छोड़ रखा है। आपको गांव में न जाने कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ता होगा। आपकी हमेशा याद आती है। बचपन से लेकर आज तक आप लोगों ने मेरे लिए न जाने क्या-क्या किया और जब मेरी कुछ करने की बारी आई, तो आप लोगों को भगवान भरोसे छोड़ दिया। मम्मी-पापा आप मुझे माफ कर दें। मुझे अब अपनी जिम्मेदारी का एहसास हो गया है। समझ में आ गया है कि मां-बाप तो बेटे के प्रति अपने कर्तव्य को पूरा कर लेते हैं, परंतु बेटे अपने मां-बाप के प्रति अपने कर्तव्य को पूरा करने से पीछे हट जाते हैं। मैं हाथ जोड़कर आपसे विनती करता हूं कि पत्र पाते ही मुंबई आ जाएं, ताकि मैं आपके प्रति अपना कर्तव्य पूरा कर सकूं। टिकट साथ्‍ा में भेज रहा हूं, मना नहीं कीजिएगा। पिछली गलती के लिए माफी चाहता हूं।
आपका पुत्र,
आशीष.”

मां-बाप बेटे का करुणा और कर्तव्य-बोध से भरा पत्र पाकर निहाल हो गए। बेटे के बुलावे पर वे मुंबई आ गए। बेटा स्टेशन से उन्हें घर ले गया, क्योंकि घर पर बूढ़े मां-बाप के कर्तव्य उनका इंतजार कर रहे थे और बेटा अपने कर्तव्य से मुक्ति पा चुका था।

Image Courtesy: ARYA SAMAJ BHAJAN.

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