Janmashtami Special: इन प्रतीकों में छुपी है कान्हा की असली पहचान!

वंशी या मुरली के बिना श्रीकृष्ण की कल्पना नहीं की जा सकती। इसी तरह श्रीकृष्ण का मोर मुकुट, गायें, माखन और दूध से बने खाद्यों के प्रति उनका लगाव, नृत्य और रास उनके व्यक्तित्व से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। जिन प्रतीकों के कारण उनका यह स्वरूप उभर कर आता है, आइए उनके सौंदर्य और मर्म पर थोड़ा विचार करें।

क्या कहती है कान्हा की मुरली

इससे निकलने वाले सुर हर किसी का मन मोह लेते हैं। इसे बनाने में किसी खास तकनीक का उपयोग नहीं करना पड़ता। यह अत्यंत सहज है, इसमें कोई गांठ नहीं है। एक बार गोपिकाओं ने बांसुरी से कहा, ‘हे बांसुरी ! तुमने ऐसी कौन-सी तपस्या की है, जो तुम श्रीकृष्ण के होंठों पर सहज ही स्थान पा जाती हो।’ वंशी ने कहा, ‘हे गोपिकाओं! मैंने अपना तन कटवाया, अंग-अंग छिदवाया। मैंने अपने आपको इस तरह स्थिर किया कि श्रीकृष्ण ने जो तान छेड़नी चाही, मैंने उसे ही अपनाया।’

कान्हा के मुकुट में सजे मोरपंख

श्रीकृष्ण के मोर-मुकुट धारण करने के पीछे अनेक कथाएं प्रचलित हैं, जैसे कि नृत्य-क्रिया में मोर की आंखों से आंसू गिरने लगते हैं। इन आंसुओ से ही मोरनी को गर्भधारण होता है। इस प्रक्रिया में मोर में अंशमात्र भी वासना का भाव नहीं होता। मोर को चिर-ब्रह्मचर्य युक्त प्राणी समझा जाता है। अत: प्रेम में ब्रह्मचर्य की महान भावना को समाहित करने के प्रतीक रूप में श्रीकृष्ण मोर पंख धारण करते हैं। मोर मुकुट का गहरा रंग दु:ख और कठिनाइयों, हलका रंग सुख, शांति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम को जहां शेषनाग का अवतार माना गया है, वहीं मोर को नागों का परमशत्रु माना गया है। इस प्रकार से श्रीकृष्ण ने विरोधाभाषों को स्वयं में सम्मिलित कर उच्चतर जीवन मूल्य की अवधारणा स्थापित की है।

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यमुना के तीरे खेलें कन्हैया

यमुना को गंगा की ही तरह पवित्र माना गया है। यमुना से श्रीकृष्ण को बहुत लगाव था। गंगा को जहां ज्ञान का प्रतीक माना जाता है, वहीं यमुना को भक्ति का। श्रीकृष्ण की भक्ति में रंगी यमुना का पानी भी श्याम वर्ण का दिखाई पड़ता है। यमुना के किनारे काली नामक नाग का बड़ा आतंक था, उसके कारण घाट का पानी इतना जहरीला हो गया था कि मनुष्य या पक्षी उसे पीते ही मर जाते थे। तब श्रीकृष्ण ने नाग को नाथ कर उसे भविष्य में वहां न जाने की हिदायत दी थी। श्रीकृष्ण जब गाय चराने जाते, तब उनके सभी बाल सखा उनके साथ रहते थे और वे सभी लोग यमुना के किनारे खेलते और गाय चराते थे। इस तरह यमुना के प्रति श्रीकृष्ण का लगाव भक्ति और प्रेम के आगे उनके झुक जाने का प्रतीक है।

ग्वाल बाल संग कान्हा खाएं माखन

भगवान श्रीकृष्ण को दूध की बनी चीजें ज्यादा पसंद हैं, जिसमें कि माखन से उनका लगाव जग जाहिर है। माखन खाने में उनको सबसे ज्यादा मजा तब आता था, जब वो किसी का माखन चुरा के खाते थे। इसी कारण श्रीकृष्ण को माखन चोर भी कहा जाता है। भगवान की इस दिव्य लीला को कुछ लोग आदर्श के विपरीत भी मानते हैं। उनको पहले समझना चाहिए कि चोरी क्या है और वह किसकी होती है। चोरी उसे कहते हैं जब किसी दूसरे की चीज कोई चुरा ले और उसे पता भी न चले। श्रीकृष्ण गोपियों के घर से माखन उनकी मर्जी से चुराते थे और चोरी करने के बाद उनके सामने से निकल भी जाते थे। भगवान के भक्तों का हृदय ही माखन है, जिसे वे चुराते थे और फिर मटकी फोड़ देते थे, क्योंकि जब यह मन भगवान का हो गया तो इस देह रूपी मटकी का क्या काम। वास्तव में अपनी माखन चोरी की इस लीला से ही श्रीकृष्ण ने सामाजिक न्याय की नींव डाली।

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रास रचैया किशन कन्हैया

कहते हैं, जब सभी रस समाप्त होते हैं, वहीं से रास लीला शुरू होती है। रास लीला में प्रेम की अनवरत धारा प्रवाहित होती है। श्रीकृष्ण अपनी संगीत एवं नृत्य की कला से गोपिकाओं को रिझाते थे। जितनी गोपिकाएं, उतने ही श्रीकृष्ण। रसाधार श्रीकृष्ण का महारास ‘जीव का ब्रह्म से सम्मिलन’ का परिचायक और प्रेम का एक महापर्व है। एक अति महत्वपूर्ण बात और भी है, वह यह है कि जब श्रीकृष्ण ने हमेशा-हमेशा के लिए गोकुल यानी वृंदावन छोड़ा तब उनकी उम्र मात्र नौ वर्ष की थी। इससे यह तो स्पष्ट है ही कि श्रीकृष्ण जब गोप-गोपिकाओं के साथ गोकुल में थे, तब नौ वर्ष से भी छोटे रहे होंगे। अति मनोहर रूप, बांसुरी बजाने में अत्यंत निपुण, अवतारी आत्मा होने के कारण जन्मजात प्रतिभाशाली आदि तमाम बातों के कारण वे आसपास के पूरे क्षेत्र में अत्यंत लोकप्रिय थे। नौ वर्ष के बालक का गोपियों के साथ नृत्य करना एक विशुद्ध प्रेम और आनंद का ही विषय हो सकता है। वास्तविकता यह है कि रास शब्द ‘रस’ से ही बना है और रस शब्द का अर्थ है आनंद।

गौ के पालक श्री गोपाल

भगवान श्रीकृष्ण को गायों से बहुत लगाव था। वो बचपन से ही गाय चराने के लिए अपने बड़े भाई बलराम के पीछे-पीछे जंगल की ओर भाग जाया करते थे। भगवान ग्वाल-बालों के साथ गाय चराते और अपने कमलवत चरणों से वृंदावन की धरती को पावन करते। जब श्रीकृष्ण गायों के पीछे भागते-भागते थक जाते, तब किसी ग्वाल बाल की गोद में सिर रख कर सो जाते। उसी समय ग्वाल बाल नि:स्वार्थ भाव से उनके चरण दबाने लगते। भगवान श्रीकृष्ण ने योगमाया के बल पर अपने ऐश्वर्यमय रुप को छिपा रखा था। गाय में ही सारे देवी-देवताओं का वास है। इसलिए जो लोग गाय की पूजा करते हैं, गाय उनकी सारी इच्छाएं पूरी करती है।

आप सभी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं!

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