9 लव टिप्स जो बनाएंगे आपके रिश्ते की कच्ची डोर को मजबूत!

किसी रास्ते की तरह ज़िंदगी, मंज़िल से पहले कहीं रूकती नहीं। रास्ते पर मुसाफिरों की तरह ज़िंदगी में भी लोग आते-जाते रहते हैं। कुछ दो कदम साथ चलते हैं, तो कुछ मंज़िल तक साथ निभाते हैं। साथ चाहे चंद क़दमों का हो या चंद मीलों का, ज़िंदगी पर छाप छोड़ ही जाता है। …या यूं कहें कि हमारी ज़िंदगी की कहानी ही इन मुलाकातों, साथों और निबाहों की लेखनी से लिखी जाती है। यह साथ, यह मुलाकात…, यह रिश्ते ही हैं, जो हमारी ज़िंदगी को शक्ल देते हैं। मगर, अक्सर इन रिश्तों में ईमानदारी की अहमियत को लोग नज़रअंदाज़ कर जाते हैं। नतीजा यह होता है कि रिश्तों के जिस नाज़ुक ताने-बाने में हम ज़िंदगी को संजोते हैं, वही हमारी बंदिश बन जाता है, रिश्ते जेल से हो जाते हैं। ज़रा सी अनदेखी इसमें दरार डाल देती है।

रिश्तों की कहानी भी सिर्फ दो ही लफ्जों की है। ये कीमती अल्फाज हैं, ‘भरोसा’ और ‘मर्जी’। शायर कैफी आजमी ने इन्हीं अल्फाज को कुछ इस तरह पिरोया है…

दायरे इनकार के इक़रार की सरगोशियां
ये जो टूटें कभी, तो इक फ़ासला रह जायेगा।

बात बहुत सीधी सी है कि किसी भी रिश्ते में दूसरे की मर्जी का खयाल रखना, उसका भरोसा जीतना और उसे कायम रखना, सिर्फ यही मायने रखता है। कई लोगों को लगता होगा कि हमने तो इन बातों का पूरा खयाल रखा मगर फिर भी रिश्ते में दरार आ ही गई। दरअसल, इन बातों का खयाल रखना, पलकों पर कांच के सपने पालने जैसा है। जरा सी चूक भी रिश्ते में गांठ डाल देती है। लेकिन अगर हम कुछ बातों का ध्यान रखें तो यही रिश्ते हमारी जिंदगी की जमापूंजी भी बन सकते हैं।

बनाएं भरोसे की इमारत

करीब आइए, मगर…

किसी भी रिश्ते में एक-दूसरे की निजता का खयाल रखना बहुत जरूरी है। कई बार ऐसा होता है कि किसी रिश्ते में हम साथी को बहुत करीब लाना चाहते हैं, मगर उसे हम पर भरोसा करने के लिए समय की जरूरत होती है। ऐसे में हम अगर ज्यादा करीब आने की कोशिश करें तो दूरी बढ़ती जाती है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि दोनों ही साथी करीबी तो चाहते हैं, लेकिन एक दायरे में रहकर। ऐसे रिश्तों में अगर आप अपने साथी के जीवन में अनावश्यक तांक-झांक करेंगे तो यकीन मानिए, यह साथ बहुत ज्यादा दिन नहीं टिक पाएगा। रिश्ते को परिपक्वता तक ले जाने के लिए दोनों को ही कदम बढ़ाने होंगे और एक-दूसरे को समय देना होगा। ऐसा करके ही रिश्ते की नई और मजबूत नींव रखी जा सकेगी।

हमारी बात रहे सिर्फ हमारे बीच…

रिश्ते की उम्र बढ़ने के साथ-साथ आप दोनों के बीच भरोसे की गहराई भी बढ़ेगी। ऐसे में कई बार आपका साथी आपसे कई निजी बातें साझा करेगा। रोजमर्रा के काम से जुड़ी बातें, दफ्तर के तनाव की बातें, पिछली जिंदगी से जुड़ी बातें…। इनमें कई राज भी छुपे होंगे। यह जरूरी नहीं कि बातचीत के वक़्त ही यह स्पष्ट हो जाए कि आपका साथी यह बात किसी और से साझा करना चाहता है या नहीं। ज़रूरी यह है कि आप दोनों के बीच हुई बातें, आप दोनों के बीच ही रहें। अगर आपने जाने-अनजाने साथी की ऐसी कोई निजी बात किसी और से साइा की तो यकीन मानिए कि आपके साथी को यह बुरा ही लगेगा। अपने रिश्ते की गरिमा को बनाए रखना आपके ही हाथ में है। आपसे कही गई बातें, सिर्फ आपके कानों के लिए ही होती हैं। इसलिए, यह ध्यान रखिए कि ये किसी और तक न पहुंचें।

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दो के बीच में न आए तीसरा…

आप और आपका साथी अगर एक-दूसरे पर अटूट भरोसा करते हों तो शायद इस बात का ध्यान रखने की जरूरत ही न पड़े। मगर हर रिश्ते का एक शुरुआती दौर ऐसा होता है, जब भरोसा तो होता है, लेकिन पूरा नहीं। ऐसे ही वक्त में जरूरत होती है यह ध्यान रखने की कि आपके रिश्ते में किसी तीसरे की घुसपैठ न हो। आपके या आपके साथी के जानने वाले, साथ में काम करने वाले या फिर कोई और, आप दोनों के रिश्ते पर टीका-टिप्पणी कर सकता है। कई बार ये टिप्पणियां दुर्भावनापूर्ण होती हैं, तो कई बार अनजाने या मजाक में ही निकल गई बातें। कारण चाहे कुछ भी हो, ये टिप्पणियां रिश्ते में दरार डालने के लिए काफी होती हैं। जरूरी है कि टिप्पणी करने वाला अगर आपका कोई परिचित हो तो उसे तुरंत कड़ाई से टोकें। हो सके तो अपने साथी के सामने ही इस तरह की टिप्पणियों का विरोध करें, ताकि उसे भी ये पता चल सके कि आप इस रिश्ते की गरिमा बनाए रखने के प्रति कितने गंभीर हैं। यदि टिप्पणी आपके साथी के किसी परिचित की तरफ से आई हो तो उसे भी यही सलाह दें और साथ ही इस बात की दुहाई भी कि अगर उसे आपसे रिश्ता रखना हो तो भरोसा जीतने का एक मौका भी देना होगा।

तुम जरूरी हो मेरे लिए…

एक-दूसरे पर भरोसा करने का पहला कदम होता है, एक-दूसरे की अहमियत को पहचानना और स्वीकार करना। अक्सर ऐसा होता है कि हम झूठे स्वाभिमान के चलते अपने साथी की अपनी जिंदगी में अहमियत को स्वीकारते ही नहीं हैं। हम उससे भरोसे की उम्मीद तो करते हैं, मगर उस पर भरोसा नहीं करते। अगर गौर करेंगे तो पाएंगे कि हम अपने ज्यादातर रिश्तों में सिर्फ इसी कमी के चलते फासले बना लेते हैं। यह कदम इतना मुश्किल भी नहीं होता। हम ठुकराए जाने के डर से खुद को किसी दूसरे को सौंपने में डरते हैं, मगर जरा सा भरोसा दूसरे पर कीजिए तो सही। यकीन मानिए, बदले में भरोसा, सहारा, प्यार और साथ, आपको सब कुछ मिलेगा।

प्राथमिकता भी उसी को…

आपकी प्राथमिकताएं जरूरी होंगी, मगर आपके साथी की प्राथमिकताओं को आप नजरअंदाज नहीं कर सकते। आप दोनों को ही साथ बैठकर यह तय करना होगा कि किस प्राथमिकता को कब पूरा किया जाए। इससे जिस काम को आप अपने साथी से ऊपर प्राथमिकता देना चाहते हैं, उसे अपने आप ही प्राथमिकता मिल जाएगी और साथी को यही लगेगा कि आपने उसे प्राथमिकता दी है।

लिखें मर्जी की इबारत

जरूरी नहीं कि दोनों की पसंद एक जैसी ही हो…

दो लोग एक-दूसरे का साथ पसंद करते हों तो ये जरूरी नहीं कि उनकी सारी पसंद-नापसंद एक ही हो। रिश्ता चाहे कोई भी हो, साथ आने का फैसला किसी वैचारिक समानता या व्यक्तित्व के किसी एक पहलू का देखकर किया जा सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि हर चीज पर दोनों की पसंद एक हो। हो सकता है कि दो लोगों को एक जैसी किताबें पसंद हों, मगर खान-पान में पसंद न मिलती हो। एक जैसे कपड़े पसंद हों, मगर फिल्मों में पसंद जुदा हो। ऐसा होना न तो बुरा है और न ही किसी रिश्ते का अंत। जरूरी सिर्फ इतना है कि आप अपने साथी की पसंद-नापसंद का भी खयाल रखें। हर जगह जहां आप दोनों साथ हों, वहां ये जरूर देखें कि कुछ चीजें आपकी पसंद की हों तो कुछ आपके साथी की पसंद की। ऐसा करने से न सिर्फ आप दोनों का समय अच्छा बीतेगा, बल्कि आपके साथी को यह महसूस होगा कि आप उनका खयाल रखते हैं।

एक-दूसरे को दें पूरी आजादी…

आप भले ही अपने साथी को कितना ही चाहते हों, या फिर आपकी हसरत जिंदगी का हर पल उसके साथ बिताने की हो, फिर भी इस बात का खयाल रखें कि आपका यह प्यार उसके पांवों की बेड़ी न बन जाए। किसी भी रिश्ते में आजादी बहुत जरूरी है। कहते भी हैं कि अगर आप किसी से प्यार करते हैं तो उसे खुला छोड़ दीजिए। अगर वो भी आपसे प्यार करता होगा तो अपने आप ही आपके पास लौटकर आएगा। अपने साथी को कभी-कभी थोड़ा वक्त उसके खुद के लिए दीजिए। इससे उसको आपसे दूर बिताए वक्त में आपकी कमी खलेगी, तो मिलने पर प्यार भी और ज्यादा बढ़ेगा।

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दें एक-दूसरे को दिल से पूरा सम्मान…

आप और आपके साथी अकेले में एक-दूसरे के साथ भले जैसे भी पेश आते हों, इस बात का खयाल रखें कि सार्वजनिक स्थान पर या जानने वालों के बीच आप अपने साथी को पूरा सम्मान दें। ये सम्मान सम्बोधन से लेकर बातों तक हर जगह झलके। इस बात का खयाल रखें कि मजाक में भी कभी सबके बीच आप अपने साथी का अपमान न करें। अकेले में भी इस बात का ध्यान रखें कि आप दोनों के बीच भले ही कितना ही मजाक क्यों न हो, कभी भी अपने साथी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली बातें न करें। इस बात का भी खयाल रखें कि पिछली जिंदगी से जुड़ी बातों का मजाक न उड़ाएं। यह जरूरी है कि बातों में स्वच्छंदता के साथ-साथ यह ध्यान रखा जाए कि दो लोगों के बीच होने वाले हंसी-मजाक में दोनों की मर्जी शामिल हो। यकीन कीजिए, आप जितना सम्मान अपने साथी को देंगे, बदले में उतना ही सम्मान पाएंगे भी।

‘मैं’ नहीं ‘हम’ बनें…

दो लोगों की जिंदगी साथ भले ही चले, फिर भी कई मायनों में अलग ही होती है। परिवार, दफ्तर, दोस्त कई चीजें ऐसी होती हैं जो एक-दूसरे की प्राथमिकताओं में अंतर पैदा करती हैं। आपका रिश्ता भले ही कितना मजबूत हो, प्राथमिकताओं की ये खींचतान दो लोगों के बीच फासले बना ही देती है। ऐसे में जरूरी है कि रिश्ते की अहमियत को पहचानें और ‘मैं’ के बजाय ‘हम’ सोचना शुरू करें। अपने रिश्ते में कभी अहम् (मैं) को न आने दें, हर बात ‘हम’ से शुरू करके ‘हम’ पर ही खत्म करें। यकीन मानिए, ये मुश्किल नहीं है। आपको सिर्फ दूसरे के दृष्टिकोण से परिस्थिति को देखने की जरूरत है। एक बार अगर आप ऐसा करने में सफल हो गए तो फिर प्राथमिकताएं खुद-ब-खुद बदल जाएंगी।

Image Courtesy: Pexels.

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