Maha Sati Ansuya ki Kahani in Hindi - महा सती अनुसुइया की कहानी हिंदी में

सती अनुसुइया की परीक्षा – जब सती के तप से त्रिदेव बन गए शिशु!

भारत में सतीत्व को शक्ति और भक्ति का समन्वय माना जाता है । इसे चारित्रिक शुचिता का चरम आदर्श भी माना जाता है। भारत में ऐसी उज्जवल चरित्र की महिलाओं की एक लंबी श्रृंखला है और इस श्रृंखला में सती अनुसूया का नाम सबसे ऊपर आता है। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र परम तपस्वी महर्षि अत्रि इनके पति थे। अपनी सतत सेवा तथा प्रेम से इन्होंने महर्षि अत्रि के हृदय को जीत लिया था। सती अनुसूया पतिव्रत धर्म के लिए प्रसिद्ध हैं। वनवास काल में जब राम सीता और लक्ष्मण चित्रकूट में महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुंचे तो अनुसूया ने सीता को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी थी। sati ansuya ki kahani | sati ansuya ki kahani

महा सती अनुसूया की कथा… | sati ansuya ki kahani

लक्ष्मी जी, पार्वती जी और सरस्वती जी को अपने पतिव्रता होने का बड़ा अभिमान था। उन्हें ऐसा लगता था कि जितनी एकनिष्ठ होकर वह अपने पतियों की सेवा करती हैं, उसकी बराबरी करने वाला दुनिया में कोई भी नहीं है। इनके अहंकार को नष्ट करने के लिए भगवान ने नारद जी के मन में प्रेरणा दी। नारद जी ने तीनों देवियों के समक्ष उपस्थिति होकर अनुसूया के पतिव्रता धर्म का गुणगान किया। त्रिदेवियों को यह प्रशंसा बहुत चुभ गई। ईर्ष्यावश त्रिदेवियों ने अपने पतियों को अनुसूया के पतिव्रता धर्म की परीक्षा लेने के लिए भेजा। sati ansuya ki kahani | sati ansuya ki kahani

त्रिदेव यतियों के वेष धारण कर अत्रि के आश्रम में पहुंचे और भिक्षा देने का आग्रह किया। अनुसूया ने त्रिमूर्तियों का उचित रूप से स्वागत करके उन्हें भोजन के लिए निमंत्रित किया। तभी उन यति वेशधारी त्रिदेवों ने यह शर्त रख दी कि वह नग्न स्त्री के हाथों से परोसा गया भोजन ही ग्रहण करते हैं । इससे सती के समक्ष धर्मसंकट पैदा हो गया। इस समस्या का समाधान करने हेतु सती अनुसूया ने त्रिदेवों को बालक बना दिया और उनका उचित सत्कार किया और दुग्धपान कराया। sati ansuya ki kahani | sati ansuya ki kahani

उसी समय कहीं से एक सफेद बैल आश्रम में पहुंचा और द्वार के सम्मुख खड़े होकर सिर हिलाते हुए उसने पायलों की ध्वनि की। एक विशाल गरुड़ पंख फड़फड़ाते हुए आश्रम के ऊपर से उड़ने लगा। एक राजहंस विकसित कमल को चोंच में लिए हुए आश्रम में उतर आया। उसी समय महती वीणा पर नीलांबरी राग का आलाप करते हुए नारद जी और उनके पीछे लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती आ पहुंचे। sati ansuya ki kahani | sati ansuya ki kahani

नारद जी अनुसूया से बोले- “माताजी! अपने पतियों से संबंधित प्राणियों को आपके द्वार पर पाकर ये तीनों देवियां यहां पर आ गई हैं। इनके पतियों को कृपया इन्हें सौंप दीजिए।” अनुसूया ने विनयपूर्वक तीनों देवियों को प्रणाम करके कहा- “माताओं! उन झूलों में सोने वाले शिशु अगर आप के पति हैं तो इनको आप ले जा सकती हैं।” sati ansuya ki kahani | sati ansuya ki kahani

तीनों देवियों ने चकित होकर एक-दूसरे की तरफ देखा। एक समान लगने वाले तीनों शिशु गहरी निद्रा में सो रहे थे। इस पर लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती संकोच करने लगीं। तब नारद ने उनसे पूछा, ”क्या आप अपने पति को पहचान नहीं सकती?” नारद जी के ऐसा कहने पर देवियों ने जल्दी-जल्दी एक-एक शिशु को उठा लिया। इसके बाद वे शिशु एक साथ त्रिमूर्तियों के रूप में खड़े हो गए। तब उन्हें मालूम हुआ कि सरस्वती ने शिवजी को, लक्ष्मी ने ब्रह्मा को और पार्वती ने विष्णु को उठा लिया है। तीनों देवियां लज्जित होकर दूर जा खड़ी हो गई। इस पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश इस तरह सटकर खड़े हो गए, मानो तीनों एक ही मूर्ति के रूप में मिल गए हो । उसी समय अत्रि महर्षि अपने घर लौट आए। अपने घर त्रिमूर्तियों को पाकर हाथ जोड़ने लगे। sati ansuya ki kahani | sati ansuya ki kahani

त्रिमूर्तियों ने प्रसन्न होकर अत्रि एवं अनुसूया को वरदान दिया कि वे सभी स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवतार लेंगे। बाद में त्रिमूर्तियों की समन्वित शक्ति का अवतरण भगवान दत्तात्रेय के रूप में हुआ। sati ansuya ki kahani | sati ansuya ki kahani

Image Courtesy: Panditbooking. sati ansuya ki kahani | sati ansuya ki kahani

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