Mahashivratri Puja Vidhi in Hindi - महाशिवरात्रि पूजा विधि | Shivratri Pooja

Maha Shivratri 2018: सुख, समृद्धि और सफलता पाने के लिए महादेव को ऐसे करें प्रसन्न!

फाल्गुन मास की शिवरात्रि महाशिवरात्रि के नाम से जानी जाती है। क्षय होते हुए वर्ष के अंतिम मास में अर्थात् ठीक एक मास पूर्व फाल्गुन में इस पर्व को मनाने का अपना एक अलग महत्व है। रुद्रों के एकादश संख्यात्मक होने के कारण भी इस पर्व का ग्यारहवें मास यानी फाल्गुन में संपन्न होना इसके रहस्य पर प्रकाश डालता है। भगवान शंकर की कृपा प्राप्त करने के लिए शिव के निमित्त शिवरात्रि का यह व्रत अत्यंत उत्तम और कल्याणकारी है। अत: इस दिन पूरे विधि-विधान के साथ भगवान शिव की पूजा कर भक्तों को व्रत रखना चाहिए।

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महाशिवरात्रि पूजा विधि…

इस दिन शुभ मुहूर्त में पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख करके भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए। शिवजी के पूजन में श्वेत चंदन, अक्षत, मौली, पुष्प, बिल्वपत्र, धूप-दीप, नैवेद्य, दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल, पान के पत्ते, सुपारी, लौंग, इलायची, केसर, यज्ञोपवीत आदि को जरूर शामिल करें। गंगाजल से तीन बार आचमन कर शिव पूजा का संकल्प लें और फिर मनोकामना सिद्धि के लिए शिवजी का बताई गई सामग्री से पूजन करें। पंचामृत से शिवजी का अभिषेक करवाएं। नैवेद्य आदि अर्पित करने के बाद शिवजी की आरती करें। श्वेत चंदन का टीका स्वयं करें और उपस्थित जनों को भी लगाएं।

रात्रि पूजन ही क्यों…

भगवान शंकर संहार, शक्ति और तमोगुण के अधिष्ठाता हैं, अत: तमोमयी रात्रि से उनका स्नेह होना स्वाभाविक है। यही कारण है कि भगवान शंकर की आराधना न केवल इस रात्रि में बल्कि हर प्रदोष (रात्रि के प्रारंभ होने) के समय में की जाती है। इस व्रत में रात्रि जागरण व पूजन का बड़ा ही महत्व है। सायंकालीन स्नानादि से निवृत्त होकर यदि वैभव साथ देता हो, तो वैदिक मंत्रों द्वारा प्रत्येक पहर में वैदिक विद्वान समूह की सहायता से पूर्व या उत्तराभिमुख होकर रुद्राभिषेक करवाना चाहिए। इसके पश्चात् सुगंधित पुष्प, गंध, चंदन, बिल्वपत्र, धतूरा, धूप-दीप, भांग, नैवेद्य आदि द्वारा रात्रि के चारों पहर में पूजा करनी चाहिए। महादेव को दुग्ध स्नान बहुत ही पसंद है। अत: दूध से उनका अभिषेक जरूर करें। लेकिन जिनके लिए यह संभव नहीं हो, उन्हें श्रद्धा विश्वास के साथ किसी शिवालय में या फिर अपने घर में ही उपरोक्त सामग्री द्वारा पार्थिव पूजन, प्रत्येक पहर में करते हुए ‘ॐ नम: शिवाय’ का जप करना चाहिए। अगर चारों पहर की पूजा संभव न हो, तो पहले पहर की पूजा अवश्य ही करनी चाहिए। इस प्रकार अंतिम पहर की पूजा के साथ ही समुचित ढंग व बड़े आदर के साथ प्रार्थना करते हुए पूजन संपन्न करें। तत्पश्चात् स्नान से निवृत्त होकर व्रत खोलना चाहिए।

शिव मंत्र:

‘ॐ त्र्यंबकं यजामहे सुगंन्धिम् पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बंधनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।’

‘ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्।’

इन मंत्रों के साथ भगवान शिव जी की पूजा करें। श्वेत वस्त्र पहनें। इस दिन रुद्राष्टक और शिवपुराण का पाठ सुनें और सुनाएं। रात्रि में जागरण करके नीलकंठ कैलाशपति का भजन और गुणगान करना चाहिए। तुलसी के सामने दीपक जलाएं। नंदी की पूजा करें। गुरुजनों व बड़ों का आशीर्वाद लें। इस प्रकार महाशिवरात्रि का व्रत करने से भगवान शिव सानिध्य प्राप्त होता है।

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सत्यम, शिवम, सुंदरम…

ईश्वर सत्य है, सत्य ही शिव है और शिव ही सुंदर है। सत्यम, शिवम सुंदरम का यह वेद वाक्य सांसारिक दर्शन की व्याख्या करने में पूरी तरह सक्षम है। जो सत्य है, वही ईश्वर भी है। यानि उसका प्रभाव ईश्वरीय होता है। जो सत्य है वही शिव यानि कल्याणकारी है। असत्य कभी भी कल्याणकारी नहीं हो सकता। इनमें ही सौंदर्य है। जो सत्य है और कल्याणकारी है तो सौंदर्य भी उसी में है। विध्वंस और असत्य में कभी भी सौंदर्य के तत्व नहीं रहे। कल्याण के देवता शिव के महापर्व शिवरात्रि पर पूजन अर्चन के साथ ही अगर शिव के दर्शन को भी आत्मसात कर लिया जाए तो मनुष्य को औलोकिक ज्ञान की प्राप्ति होती है। शिव को सृजन और प्रकृति का संचालक भी माना गया है। शिव को त्याग और तपस्या का पर्याय भी कहा है। शिव जीवन की नश्वरता का प्रतीक भी हैं।

जय शिव शंकर!

Image Courtesy: Pixabay.

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