माँ – एक शब्द जो है पूरा महाकाव्य | Happy Mother’s Day Everyone!

दुनिया भर का इतिहास और साहित्य मां की गौरव गाथाओं से भरा पड़ा है। Mother’s Day के बहाने ही सही, आइए मातृसत्ता के इस स्वरूप को नमन करते हुए हम अपनी मां, मातृभूमि और मातृभाषा के प्रति अपने कर्तव्य को पुन:-पुन: याद करें।

पुत्र सुपुत्र था। उसने मां को चारों धामों की यात्रा करवाई। मां का निधन हुआ तो उसने विधि-विधान से अंतिम संस्कार किया। गया में पिंडदान करने के बाद उसने आश्वस्त भाव से पुरोहित से कहा – ‘पंडित जी, आज मैं मां के संपूर्ण ऋण से उऋण (मुक्त) हो गया।’

पुरोहित ने मुस्कराते हुए कहा, ‘यजमान, आप मां के संपूर्ण ऋण से नहीं, बल्कि उसके एक लक्षांश मात्र से उऋण हुए हैं।’

‘क्या कह रहे हैं पंडित जी? लक्षांश मात्र, यानी सिर्फ एक लाख वां हिस्सा?’, पुत्र ने आश्चर्यचकित होकर कहा।

‘जी हां, सिर्फ एक लाखवां हिस्सा। जब तुम सिर्फ एक सप्ताह के थे, तब माघ की कंपकंपाती ठंड की एक रात में तुमने बिस्तर गीला कर दिया था। मां को बुखार था। वह खुद ठंड से कांप रही थी, लेकिन उसने तुम्हें गीली जगह से खिसकाकर सूखी जगह पर लिटा दिया और खुद उस गीली जगह पर लेट गई। आज तुम सिर्फ उस एक कर्ज से मुक्त हुए हो।’

पुत्र उदास हो गया। उसे लगा कि मां की सेवा करना, उसे तीर्थ-व्रत कराना, उसका अंतिम संस्कार करना, पिंडदान आदि सब कुछ व्यर्थ गया।

पुरोहित ने यजमान की हताशा भांप ली। और कहा, ‘यजमान सच तो यह है कि दुनिया में कोई भी संतान मां के कर्ज से कभी मुक्त हो ही नहीं सकती। इसलिए कोई अगर उसके ऋण का लक्षांश भी चुका दे, तो वह धन्य हो जाता है।’

सच में कोई भी मां के ऋण से उऋण नहीं हो सकता। मनुष्य को तो छोड़िए, इतिहास और मिथिहास भी मां के कर्ज से कभी मुक्त नहीं हो सकते हैं। दुनिया की अनेक मांओं ने धीर, वीर, संत और क्रांतिकारी सुपुत्रों को जन्म देकर समय को अपना ऋणी बना दिया है। आइए कुछ ऐसी ही मांओं के बहाने हम आज संपूर्ण मातृसत्ता को प्रणाम करें।

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शुरुआत करते हैं भारतीय महाकाव्यों के सर्वोच्च महानायक मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और उनकी मां कौशल्या से। कौशल्या ने श्रीराम के रूप में दुनिया को एक ऐसा रत्न दिया, जिसकी चमक आज भी दुनिया को नीति और मर्यादा की राह दिखाती है। कौशल्या ने तो दुनिया को उसके दुख दूर करने वाला सुपुत्र दिया पर क्या आप जानते हैं कि उनके लिए सबसे बड़ा सुख क्या था? उनके लिए सबसे बड़ा सुख था श्रीराम की शिशु लीला का साक्षी बनना। जब रामचंद्र प्रकट होते हैं तो वे कहती हैं:

कीजै सिसु लीला अति प्रियसीला,
यह सुख परम अनूपा।

राम भी उनके आग्रह को तुरंत मान लेते हैं और शिशु बनकर रोना शुरू कर देते हैं:

सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना,
होइ बालक सुरभूपा।

मां को यही परम सुख देने के लिए श्रीकृष्ण भी यशोदा से जिद करते हैं:

मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों।

या फिर सफाई देते हैं:

मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो।

और कभी कभी तो वे अपने छोटे होने का तर्क भी देते हैं:

मैं बालक बंहियन को छोटो,
छींको केहि बिधि पायो।

पुत्र सुपुत्र हो जाए, तो उसका होना ही मां के जीवन की सफलता है। हर मां की आकांक्षा होती है कि उसका पुत्र यशस्वी हो, और हर स्त्री ऐसी मां को हसरत भरी निगाह से देखती है। तभी तो महाकवि तुलसीदास की मां हुलसी के लिए कहा गया है:

सुरतिय, नरतिय, नागतिय, सब चाहत अस होय।
गोद लिए हुलसी फिरें, तुलसी सों सुत होय।।

मां की शुभ दृष्टि पुत्र के इरादों को बज्र बना देती है। गांधारी का उदाहरण हमारे सामने है। गांधारी ने ताउम्र अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी थी। केवल एक बार उन्होंने आंखों से पट्टी खोली थी दुर्योधन को आंख भर शुभाशीष देने के लिए। वह दुर्योधन को निर्वसन (निर्वस्त्र) अपने पास बुलाती है। कृष्ण इस बात को समझ जाते हैं कि अगर गांधारी की आशीष-दृष्टि दुर्योधन के शरीर पर पड़ गई, तो उसका पूरा शरीर फौलादी हो जाएगा और फिर उसे मारना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने दुर्योधन को सलाह दी कि इस तरह मां के सामने जाने में तुम्हें शर्म नहीं आती। कम से कम एक लंगोटी तो पहन लो। दुर्योधन ने मां की आज्ञा की अवहेलना की और लंगोटी पहन कर उनके पास पहुंचा। गांधारी की दृष्टि उसके शरीर के जितने हिस्से पर पड़ी वह तो बज्र का हो गया लेकिन जितना हिस्सा लंगोट से ढंका हुआ था, उस पर मां की कृपादृष्टि नहीं पड़ सकी। अंतत: जांघ के उसी हिस्से पर गदा का प्रहार कर भीम ने दुर्योधन का अंत किया।

वास्तव में मां के बारे में जितना लिखा जाये, उतना कम ही है। प्रस्तुत हैं माँ के प्यार, ममता, समर्पण और त्याग के कुछ और उदाहरण:

सीता माता:
मां सीता के मन में ममता बरसती थी। अपने बच्चों की समुचित शिक्षा और लालन-पालन के लिए उन्होंने आश्रम के जीवन को भी खुशी-खुशी जिया। वे ममता और समर्पण का साक्षात् रूप थीं। पवन पुत्र हनुमान भी उन्हें अपनी मां बुलाते थे।

मदर टेरेसा:
मां की बात हो रही हो और मदर टेरेसा का नाम ना आये, ऐसा संभव ही नहीं। निस्वार्थ सेवा भाव की मिसाल स्थापित करने वाली मदर टेरेसा का अपना परिवार नहीं था, मगर उनके संपर्क में आना वाला हर शख्स उनका परिवार था। हर किसी के लिए उमड़ती ममता ने ही तो उन्हें मदर टेरेसा बना दिया।

मां शारदा देवी:
स्वामी रामकृष्ण परमहंस की पत्नी मां शारदा देवी मातृत्व की मिसाल थीं। शरण में आने वाला हर कोई उनका बच्चा था। जाति, धर्म से परे उन्होंने कई बच्चों को अपनाया और जगत की मां बन गईं। उनकी ममता हर एक झुलसे हुए मन को शांति प्रदान करने की सामर्थ्य रखती थी।

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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के व्यक्तित्व निर्माण में उनकी मां पुतली बाई की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पुतलीबाई ने बचपन में ही उनके अंदर ऐसे संस्कार रोप दिए थे, जिससे आगे चलकर वे एक सत्याग्रही महात्मा बन सके और देश को आजाद कराने की अहिंसक लड़ाई लड़ सके। सोचिये अगर जीजाबाई न होतीं, तो क्या शिवाजी का व्यक्तित्व वैसा ही होता, जैसा वह था। जीजाबाई ने जहां उन्हें स्वराज्य स्थापना का स्वप्न और अन्याय-अत्याचार के खिलाफ लड़ने का संबल दिया, वहीं उन्हें स्त्री का सम्मान करने की सीख भी दी। शिवाजी मां के आशीर्वाद से ही एक के बाद एक किला फतह करते गए और स्वराज्य की स्थापना की। जीजाबाई ने जहां पुत्र को अपने आदर्शों के अनुसार ढाला वहीं Maxim Gorky के उपन्यास The Mother की नायिका मां Pelageya Nilovna Vlasova (निलोवना) अपने क्रांतिकारी पुत्र Pavel Vlasov (पावेल) के विचारों के अनुसार खुद को ढालती है। एक अनपढ़ धर्मभीरु महिला का इस तरह रूपांतरण आसान काम नहीं था, लेकिन जब कोई मां बेटे के लक्ष्य को अपना लक्ष्य बना ले, तो उसके लिए कुछ भी मुश्किल नहीं होता।

स्मार्ट बनाता है मातृत्व का अहसास

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मातृत्व का अहसास माताओं को पहले से ज्यादा स्मार्ट बना देता है। उनके अनुसार एक गर्भवती मां का मस्तिष्क एक दहके लोहे की तरह हो जाता है, जो नई चोटों, चुनौतियों और ज़रूरतों का भार सहन करने के लिए एकदम तैयार होता है। इस दौरान मां के मन-मस्तिष्क और व्यवहार में विविध बदलाव होते हैं और वे पहले से कहीं ज्यादा स्मार्ट हो जाती हैं। हालांकि मातृत्व के शुरुआती दिनों की व्यस्तता के कारण उन बदलावों पर ध्यान नहीं जाता पर जब जिंदगी सामान्य होने लगती है, तो मां पहले जैसी नहीं होती। अब तक चूंकि उसने अपने केयरिंग व्यवहार, परिस्थितियों, क्रोध-ममता, सुरक्षा प्रदान करने में तत्परता जैसे भावनात्मक आवेगों की हद समझ ली होती है, इसलिए वह पहले से कहीं ज्यादा स्मार्ट हो जाती हैं। हर बच्चा मां के अंदर एक नए संसार का सृजन कर देता है, जिसमें उसे नई चुनौतियों का सामना करना होता है, और अंत में यही उसके व्यक्तित्व के लिए सकारात्मक विकास का कारण बनता है।

जादू होता है मां की आवाज और स्पर्श में

एक अन्य शोध के अनुसार, मां की आवाज से तनाव दूर होता है। मां के दूध में पाया जाने वाला एक विशिष्ट हारमोन दूध के माध्यम से बच्चों में पहुंचता है, जो मां व बच्चों के संबंध को प्रगाढ़ करता है। इसी हारमोन के कारण मां की आवाज से बच्चों में तनाव कम हो जाता है। आपको सहज विश्वास न हो, मगर मां के स्पर्श में भी एक जादुई ताकत होती है। यही कारण है कि अपनी मां के संपर्क में आने पर हम अपने सारे दुःख-दर्द भूल जाते हैं।

Mother’s Day पर मां की ममता क्षमता को हमारा शत शत नमन!

Image Courtesy: Pexels.

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