छोड़ बैसाखी, उड़ मन पाखी – Motivational Story for Success!

हर शख्स की शख्सियत किसी ना किसी विशेष परिस्थिति की देन होती है। विवेकहीन नकल आपको अपनी मूल क्षमताओं से अनजान रखेगी। सफलता पानी है, तो जीत के ऐसे सहारों को छोड़ना होगा और पहचानना होगा खुद को।

गांव में एक व्यक्ति की दुर्घटना में दोनों टांगें टूट गईं। उसने बैसाखियां थाम लीं। वह बैसाखियों के सहारे चलने लगा। धीरे-धीरे बैसाखियों के सहारे दौड़ने लगा। कुछ दिनों बाद वह नाचने-कूदने भी लगा। वह अब खेत-खलिहान, घर-परिवार के सभी काम इतने अच्छे ढंग से करने लगा, जैसे उसकी टांगें कभी टूटी ही न थी। अब वह सब कुछ कर लेता था बैसाखियों के सहारे। गांव में देखा-देखी नकल हुई। सबने सोचा बैसाखियों में ही कोई चमत्कार है। देखते ही देखते हरेक ने बैसाखी थाम ली। पूरा गांव बैसाखीमय हो गया। सब लोग बैसाखियों के सहारे छोटा-मोटा काम करने लगे।

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जिस व्यक्ति की दुर्घटना में टांगें टूट गईं थी, उसने तो बैसाखियां मजबूरी में जारी रखी थीं। लेकिन अब स्वस्थ-सानंद पूरा गांव भी बैसाखी के सहारे चलने लगा था। दुर्घटना का शिकार व्यक्ति कुछ वर्षों बाद मर गया। एक दो पीढ़ियों तक बैसाखी की व्यवस्था कायम रही। तीसरी पीढ़ी में उस गांव के एक युवक ने हिम्मत दिखाई। उसे यह सब मूर्खता भरा काम लगा कि पैरों के होते हुए भी कोई बैसाखी थामे। उसने गांव वालों को समझाया और ‘छोड़ो बैसाखी’ का शंखनाद किया। लोगों ने उसका मजाक उड़ाया। युवक ने स्वयं बैसाखियां एक तरफ फेंक दीं। वह एक कदम चला। दो कदम चला कि लड़खड़ा कर गिर गया। गांव वाले हंसने लगे। युवक ने फिर बैसाखियां थाम लीं।

अब स्वयं से प्रश्न करें। विचार-विमर्श करें अपने साथियों से और स्वयं का विश्लेषण करें।

  • दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति बैसाखियों के सहारे इतना अच्छा काम क्यों कर लेता था?
  • सारे गांव ने बैसाखियां क्यों थाम लीं?
  • गांव में पीढ़ी दर पीढ़ी बैसाखियां थामना जारी क्यों रहा?
  • मेरे जीवन में मेरी बैसाखियां/सहारा कौन-कौन और क्या-क्या हैं?
  • मैंने किस प्रकार की बैसाखी थाम रखी हैं?
  • मैं अपनी बैसाखियों से छुटकारा कब पाऊंगा?
  • मेरी अपनी शारीरिक, वैचारिक, आत्मिक, बौद्धिक आदि कितने-कितने प्रकार की आकर्षक बैसाखियां हैं?
  • मैं इस प्रकार की परम विकलांगता क्यों झेल रहा हूं ?
  • एक कार्ययोजना के अनुरूप मैं अपनी बैसाखियों की पहचान व उनसे छुटकारा प्राप्त करने की योजना पर कब अमल करूंगा?

हम तरह-तरह की बैसाखियों के आदी हो चुके हैं। हमें पता नहीं है कि सदियों से हमने कई-कई आकर्षक बैसाखियां टांग रखी हैं। वैचारिक रूप से इतनी अधिक बैसाखियां हमने लगा रखी हैं कि उन्हीं के सहारे इतनी उछलकूद मचा रहे हैं। बुद्धि का भी यही हाल है। आत्मा तो बेचारी बस बैसाखियों के सहारे ही धड़क रही है।

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आइए हम अपनी बैसाखियों की पहचान करें। फिर उन्हें पूर्ण चेतना, ऊर्जा व विवेक से छोड़ दें। हमारी अपनी मौलिकता और हमारा अपना बीज रूप ही हमारे अद्भुत व्यक्तित्व का वट वृक्ष बन पाएगा। याद रखें, वट वृक्ष का सहारा कोई दूसरा नहीं, बल्कि वह स्वयं ही होता है।

Image Courtesy: Speaking Tree.