Pandit Bhimsen Joshi Biography in Hindi - पंडित भीमसेन जोशी की जीवनी

मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा – शास्त्रीय संगीत के ‘जोशीले भीम’ थे पंडित भीमसेन जोशी!

‘मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा’ के गायक पंडित भीमसेन गुरुराज जोशी जी से सब वाकिफ हैं, लेकिन भारतीय शास्त्रीय संगीत के इस पुरोधा को बालक भीमसेन से किराना घराने का महागायक बनने तक की यात्रा में किन-किन परेशानियों से जूझना पड़ा, यह जानकारी कम ही लोगों को होगी। संगीत की शिक्षा लेने की चाह में बालक भीमसेन को भिक्षा मांगने और नौकर बनने जैसे काम भी करने पड़े, लेकिन इसके बाद भी संगीत के प्रति उनकी लगन में कोई कमी नहीं आई।

यूँ शुरू हुआ संगीत का सफ़र…

11 साल की उम्र में नाराज़ होकर छोड़ दिया था घर…

कर्नाटक में धारवाड़ जिले के गडग कस्बे में एक प्राइमरी स्कूल के हेडमास्टर गुरराज जोशी के घर 4 फरवरी 1922 को जन्मे भीमसेन ने 11 वर्ष की छोटी सी उम्र में चावल के साथ घी नहीं देने पर मां से नाराज होकर घर छोड़ दिया था। दरअसल, यह तो एक बहाना मात्र था। जिद तो ऐसे गुरु के तलाश की थी, जो उन्हें किराना घराने के उस्ताद गायक अब्दुल करीम खां की खयाल गायकी की तालीम दे सके। इस गायकी को वे अपने कस्बे में एक चाय की दुकान में मंत्रमुग्ध होकर सुना करते थे। हर सुबह ग्रामोफोन पर बजते करीम खां के राग ‘झिंझोटी’ के जादू में खिंचकर भीमसेन दुकान पर आ बैठते थे और फिर स्कूल लौटना तो ठीक, घर जाना भी भूल जाते थे। संगीतज्ञ दादा भीमाचार्य जोशी की रगों में संगीत तो बहता ही था। मां के भजनों, पास ही मंदिर से आती प्रार्थना एवं भक्ति संगीत के स्वरों और मस्जिदों से उठती मुअज्जिनों की अजान ने भी इस संगीत संस्कार में गाढ़ा रंग भर दिया था।

तलाश के लिए पिता ने भिड़ाई जुगत…

संगीत का जादू इतना सर चढ़कर बोल रहा था कि भीमसेन मानो वशीभूत होकर राह से निकलने वाली भजन मंडली के पीछे चल पड़ते थे। अक्सर वे अपने घर और कस्बे से इतनी दूर निकल जाते कि पिता को बालक की तलाश के लिए पुलिस तक की मदद लेनी पड़ती थी। बाद में पिता ने इसका एक स्थाई समाधान तलाशा। हर रोज बालक की पीठ पर अपने नाम-पतेवाली एक पर्ची इस आग्रह के साथ चस्पा कर देते थे कि ‘अगर आपको मिले तो उक्त पते पर पहुंचा दें।’ बालक भीमसेन इस तरह गाहे-बगाहे खो जाने पर पहुंचाए जाने लगे।

कई संगीत गुरुओं की सेवा कर ली संगीत की तालीम…

ग्वालियर में संगीत का पहला पाठ…

संगीत का साधक बनने के लिए उन्होंने ‘घरबदर’ होने का फैसला किया। एक मैली-कुचैली कमीज तथा हाफ पेंट पहने, बिना टिकट के ही वे गडग रेलवे सटेशन से बाजीपुर जाने वाली एक रेलगाडी में सवार हो गए। पेट की आग और संगीत की धुन के मेल से भजन, गायन और भिक्षाटन शुरू हुआ। गुरु की तलाश उन्हें पहले बीजापुर, फिर बीजापुर से ग्वालियर, ग्वालियर से पुणे, पुणे से मुंबई और फिर जाने कहां-कहां ले गई। ग्वालियर के महाराजा के दरबारी सरोद वादक हाफिज अली खां की मदद से भीमसेन ने उस जमाने के प्रतिष्ठित माधव संगीत विद्यालय में दाखिला भी लिया और यहीं गायकी के तकनीकी पहुलुओं से वाकिफ भी हुए, लेकिन इतने भर से उन्हें संतोष कहां था।

गांधार राग सीखने पहुंचे कलकत्ता…

हाफिज अली खां से शास्त्रीय रागों ‘मारवा’ और ‘पुरिया’ की बारीकियां सीखीं और विद्यालय के ही एक उस्ताद की सलाह पर कलकत्ता को निकल पडे। जोशीजी ने कलकत्ता में भीष्मदेव चटर्जी से ‘गांधार राग’ सीखा, लेकिन इससे पहले कलकत्ता में भी उन्हें कई पापड बेलने पड़े।

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संगीत साधना के लिए नौकर तक बने…

खुद पंडित जी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि वहां उन्होंने उस जमाने के मशहूर अभिनेता एवं संगीतकार पहाड़ी सान्याल के यहां नौकर का काम भी किया। संभवत: 1960 में कलकत्ता के एक संगीत समारोह में गाने पहुंचे भीमसेन से श्रोताओं में मौजूद पहाड़ी सान्याल यह जान कर पानी-पानी हो गये थे कि गुर की तलाश में भीमसेन कभी उनके यहां नौकर तक रहे थे।

गडग के पास ही हुई तलाश पूरी…

गुरु भीष्मदेव चटर्जी की भारी व्यस्तता और तालीम ले रहे शिष्यों की बहुतायत ने भीमसेन को ज्यादा समय वहां टिकने नहीं दिया। इसी दौरान उनकी मुलाकात विद्वान संगीतज्ञ विनायक राव पटवर्द्धन से हुई, जिन्होंने करीम खां की गायकी सीखने के जुनून में दर-दर की खाक छानते इस गायक को उनके अपने ही कस्बे गडग के पास कुंडगोल में रह रहे किराना घराने के मशहूर गायक पंडित रामभान कुंडगोलकर उर्फ सवाई गंधर्व की शरण लेने की सलाह दी। कुंडगोल में अब्दुल करीम खां के योग्य एवं प्रिय शिष्य सवाई गंधर्व के पास पहुंचकर गुर की उनकी तलाश पूरी होती दिखी। पंडितजी ने बाद में अपने एक संस्मरण में लिखा है कि सवाई गंधर्व के यहां दो साल उन्होंने केवल घर की साज-संभाल करते, मीलों दूर से कुएं से पानी लाते और गुरु-शिष्यों के रियाज सुनते बिताए। महबूब गायक अब्दुल करीम खां की गायकी की उनकी दीक्षा तब शुरू हुई, जब सवाई गंधर्व ने दो साल पूरे होने के बाद बुलाकर कहा, ‘भीमसेन मुझे भरोसा हो गया है, तुम सीखे बिना भागोगे नहीं।’

बच्चों-सी वह निश्छल हंसी…

पंडित भीमसेन जोशी का होना एक गरिमामय उपस्थिति का अहसास कराता था। पंडित भीमसेन जोशी जितने महान गायक थे, उतना ही सरल और निश्छल था उनका व्यक्तित्व। संगीत के इस सम्राट का व्यक्तित्व बहुत ही सरल और आकर्षक था। जो भी उनसे मिलता था, उन्हीं का होकर रह जाता था। उनकी महान शख्सीयत के उस पार एक बच्चों जैसे दिल वाला व्यक्ति था। यह निश्छलता उनकी हंसी में झलक जाती थी। एकदम बच्चों की तरह हंसते थे वे।

उनका गायन के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान है। उनकी गायकी ने किराना घराने की गायकी को बुलंदियों तक पहुंचाया है। सवाई गंधर्व के शिष्य भीमसेन जोशी ने ख्याल गायकी को नया आयाम दिया है। साथ ही कई रागों के संयोजन से नए रागों की रचना भी की। मेहनत और लगन से काम करने वालों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते थे।

शास्त्रीय गायन के क्षेत्र में नई पीढ़ी के संघर्षों को लेकर उनके अंदर खास तरह की संवेदनशीलता थी। वे दोस्तों के दोस्त थे। दोस्तों का गम उनका अपना गम होता था। पर जितना उनका व्यक्तित्व सरल था, उतनी ही जीवनशैली भी। उन्हें सादा भोजन पसंद था, जैसा कि किसी भी आम आदमी के घर में बनता है।

संगीत के सोपान पर पंडित जी…

शास्त्रीय संगीत की अविरल धारा में पवित्रता और शुद्धता के पर्याय थे, पंडित भीमसेन जोशी। उनकी अथक साधना लोगों को रसमय बनाती रही। भारतीय शास्त्रीय संगीत की जिस ऊंचाई पर हम मुग्ध होते हैं, उसे ऊंचे सोपान तक पहुंचाने में पंडित जी का कालजयी योगदान है। वह हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के किराना घराने के आखरी बड़े गायक थे। संगीत की साधना तो चलती रहेगी, पर पंडित जी जैसा तपस्वी मिल पाना सहज नहीं होगा।

पंडित भीमसेन जोशी के पास कौशल भरी तान तो थी ही, पर सबसे ज्यादा प्रभावित करती थी उनकी गायकी की आक्रामकता। मंच पर जिस तरह वह प्रस्तुत होते थे, वह देखने-सुनने लायक होता था। उनकी आवाज में एक सम्मोहन था। मंच पर भी वह एक साधक की तरह ही होते थे। सांसों के उतार-चढ़ाव पर उनका अद्भुत नियंत्रण था। उनकी आवाज शायद ही कभी क्षण भर के लिए भी डगमगाई हो, चाहे वह भजन गा रहे हों या खयाल। महाराष्ट्र की भूमि इस बात पर गौरव करती है कि वहां संत तुकाराम, संत ज्ञानेश्वर आदि की संत वाणी गूंजी है। पंडित जी जैसे सिद्ध साधक ने उन वाणियों को आत्मसात कर जब सुर लगाए, तो भक्ति का रस घुल गया। एक तरफ नवजीवन पा रहा देश और दूसरी ओर सीखी हुई परंपराओं को दृढ़ता के साथ जोड़कर देखने का पंडितजी का आग्रह शास्त्रीयता में पगे लोगों को लुभा गया। शास्त्रीयता से नाता न रखने वाले लोग भी ‘जो भजे हरि को सदा’ सुनकर भावविभोर हो जाते। हालांकि उनका मराठी उच्चारण बहुत साफ नहीं था, लेकिन यह गौण बात थी। उनके सुनने वालों के लिए उनके भाव का महत्व था। उनकी लयकारी का महत्व था। कृपा सरोवर, कमल मनोहर, जय दुर्गा दुर्गति परिहारिणी, प्रभु कर सब दुख दूर हमारे जैसे भजनों को सुनिए, आपको लगेगा पंडित जी ने डूब कर आनंद पाने के लिए गाया। वह अपनी मां से बहुत प्रभावित थे। भजन की यह लौ उनकी मां ने ही जगाई थी।

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पंडित जी की गायकी का सबसे अच्छा दौर वह था, जब वह साठ वर्ष की उम्र को पार कर रहे थे। आवाज अपनी प्रखरता में थी, स्वर उनके इशारों पर थे। शास्त्रीयता में पगे एक गायक के लिए ऐसा अवसर संपूर्णता को पाने जैसा है। उनके साथ गुरु से शिक्षा पाने वाली गंगूबाई हंगल तो अपने घराने की सीमाओं में रहीं, पर पंडित जी ने अभिनव प्रयोग भी कर दिखाए। बहुत ही सरल, भोला-भाला व्यक्तित्व था उनका और यही सद्गुण उनके संगीत में भी उतरा। शास्त्रीय संगीत के कद्रदान भी अलग तरह के होते हैं। पर जब एक समर्थ आवाज चारों ओर गूंज रही थी ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा’, तो पूरा देश आह्लादित होकर वही गा रहा था। यह समर्थ आवाज पंडित जी की ही थी।

पंडित जी की गायकी हमारी धरोहर है। उनकी ईश्वरीय आवाज हमारी परंपराओं में रहेगी। दुख यही है कि अब वह हमारे बीच नहीं हैं। संगीत की बिरादरी ने उन्हें ‘स्वर भास्कर’ कहकर उनके प्रति अपनी श्रद्धा जताई। वह सही मायनों में स्वर भास्कर ही हैं। उनकी गायकी दुनिया को संवारने के लिए है।

Image Source: Musictoday.

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