स्वामी रामानंद का जीवन परिचय हिंदी में - Swami Ramanand Biography In Hindi

जाति-पाति पूछे न कोई, हरि को भजै सो हरि का होई – मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रणेता थे स्वामी रामानन्दाचार्य!

कोई संत महात्मा नामदीक्षा देने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे और कबीर थे कि वाराणसी में गुरु को तलाश रहे थे। उन्हें साथी भक्तों ने सलाह दी स्वामी रामानंद ही एक उम्मीद हैं। उनसे दीक्षा मिल सकती है। लेकिन स्वामी रामानंद एकांतवास में चले गए थे। वे आठों पहर काशी में पंचगंगा घाट पर बनी एक गुफा में साधना में लीन रहते थे। सुबह अंधेरे में सिर्फ गंगा स्नान के लिए निकलते। इसके अलावा कभी अपनी गुफा से बाहर नहीं जाते। दीक्षा लेने के लिए उनके गंगा स्नान के समय कबीर के सीढियों पर लेट जाने और गुरु के दर्शन और चरण स्पर्श करने की घटना काफी विख्यात है। एक दिन सीढ़ियों पर लेटे कबीर का स्पर्श हुआ तो गुरु ने उन्हें उठा कर सीने से लगा लिया और कहा राम को राम ही कहो।

कबीर ने जात-पात, ऊंच-नीच, पाखंड और अंधविश्वासों का जीवन भर विरोध किया लेकिन साथ ही यह गाना कभी नहीं भूले कि अज्ञान और स्वार्थ के विरोध की यह शक्ति उन्हें अपने गुरु से मिली थी – कासी में हम प्रगट भए हैं रामानंद चेताए। अकेले कबीर ही नहीं थे, जिन्होंने ईश्वर के प्रति प्रेम, विवेक, विचार, करुणा और साधना का संदेश दिया हो। पीपा, रैदास, नरहरि, धन्ना भगत, योगानंद और अंनंत जैसे न जाने कितने ही शिष्य थे जो रामानंद के चेताए जागे थे और कबीर के शब्दों में कहें तो गोविंद से पहले अपने गुरु को प्रणाम करने के लिए तत्पर रहते थे। लेकिन स्वामी रामानंद का गीत राम को सुमिरने और सभी उपलब्धियों का श्रेय कबीर को ही देने के बोल बोलता था।

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समाज के किन्हीं भी वर्गों में तनाव उत्पन्न किए बिना सामंजस्य और सदभाव की जो गंगा, स्वामी रामानंद ने मध्यकाल के अंधकार युग में बहाई, वह अगली कई शताब्दियों तक समाज को थामे रही। उस समय की विभिन्न धाराओं की गवेषणा करते हुए इतिहास के सुधी अध्येता कहते हैं कि स्वामी रामानंद अथवा श्री रामानंदाचार्य ने अपने समय में भारतीय धर्म और संस्कृति को संगठित रखा। उन्होंने वैष्णव भक्तिधारा को पुनर्गठित किया और साधुओं को खोया हुआ आत्मसम्मान वापस दिलाया।

बादशाह गयासुद्दीन तुगलक का उदाहरण सामने है। उसने श्रद्धालुओं और साधु संतों पर कई तरह की पाबंदियां लगा रखी थी। वे खुल कर न अपने उत्सव मना सकते थे, न ही धार्मिक कर्मकांड कर पाते थे। इन कामों के लिए उन्हें एक खास किस्म का कर जजिया देना पड़ता था। वैष्णवाचार्य स्वामी रामानंद के प्रभाव से बादशाह ने न केवल साधु संतों से ज्यादतियों और बंदिशों को हटाया बल्कि उन्हें अपने उत्सव मनाने तथा अपने ढंग से रहने की छूट भी दी।

चौदहवीं शताब्दी शुरु होते ही प्रयाग के एक कुलीन और धर्मनिष्ठ परिवार में जन्मे रामानंद ने आठ वर्ष की उम्र में उपनयन संस्कार होते ही गायत्री मंत्र का जोर जोर से उच्चारण किया। संस्कार कराने वाले पंडितों ने कहा कि क्या करते हो? यह मंत्र परमकल्याणकारी है और इस तरह उच्चारण नहीं करना चाहिए। रामानंद ने कहा, यह मंत्र परम कल्याणकारी है इसीलिए सबके सामने इसका जोर जोर से उच्चारण किया। कुछ समय बाद उन्होंने वाराणसी में पंचगंगा घाट के स्वामी राघवानंदाचार्य जी से दीक्षा प्राप्त की। तपस्या तथा ज्ञानार्जन के बाद बड़े-बड़े साधु तथा विद्वानों पर उनके ज्ञान का प्रभाव दिखने लगा।

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स्वामी रामानंद ने भक्ति की जिस विशिष्टाद्वैत (जगत राममय है) का प्रवर्तन किया, उसके बारे में कहा जाता है कि इस धारा की मूलप्रेरणा सीताजी हैं। जीवन में दिव्य ईश्वरीय भाव के साथ विभिन्न मत, मतांतरों और पंथ संप्रदायों में फैली वैमनस्यता दूर करने के लिए भी स्वामीजी ने सकल हिंदू समाज को एक सूत्र में बांधने का महत्वपूर्ण कार्य किया। स्वामीजी ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को आदर्श मानकर सरल रामभक्ति मार्ग का निदर्शन किया। उनकी शिष्य मंडली में जहां एक ओर कबीरदास, रैदास, सेन नाई और पीपा जैसे जात-पात, छुआछूत, वैदिक कर्मकांड, मूर्तिपूजा के विरोधी निर्गुणवादी संत थे तो दूसरे पक्ष में अवतारवाद के पूर्ण समर्थक और चराचर में राम को ही व्याप्त मानने वाले सगुण उपासक भी थे। उनके बारे में प्रसिद्ध है कि तारक राममंत्र का उपदेश उन्होंने पेड़ पर चढ़कर दिया था ताकि यह सब जाति के लोगों के कान में पड़ सके।

भक्ति और सेवा का संदेश देते हुए उन्होंने उत्तर भारत के प्रमुख क्षेत्रों में तीर्थों की रक्षा और मठों आश्रमों की स्थापना की। उन केंद्रों के प्रभाव से ही वैरागी साधु समाज अस्त्र-शस्र से सज्जित अनी के रूप में संगठित हुआ। वहां से संगठन गांव-गांव में अखाड़ों के रूप में स्थापित हुआ। आज भी दुनिया भर में रामानंद संप्रदाय के मठ, संत, राम गुणगान, अखंड नाम संकीर्तन सबसे ज्यादा व्यवस्थित ढंग से चल रहे हैं और सर्वत्र आध्यात्मिक आलोक प्रसारित कर रहे हैं। वैष्णवों के बावन द्वारों (मठों) में सर्वाधिक सैंतीस द्वारे इसी संप्रदाय से जुड़े हुए हैं।

Image Source: Bawa Lal Ji.

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