Swami Vivekananda Biography in Hindi - स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय

स्वामी विवेकानंद जयंती : एक नए विश्व के उद्गाता थे स्वामी विवेकानंद!

महान प्रेरणा स्रोत स्वामी विवेकानंद

पूरा नाम: नरेंद्रनाथ विश्वनाथ दत्त

जन्मः 12 जनवरी, 1863.

निधनः 4 जुलाई, 1902.

धरती के इतिहास में मात्र गिने-चुने ऐसे व्यक्तियों ने जन्म लिया होगा जिनका प्रभाव न केवल युग-युगांत तक चिरस्थायी हुआ हो बल्कि जिनकी ख्‍़याति देशकाल की समस्त सीमाओं को तोड़ती हुई विश्व के प्रत्येक कोने में अपनी केसर-कस्तूरी को बिखेर कर उसे आप्लावित करने में पूरी तरह सफल और समर्थ रही हो। स्वामी विवेकानन्द इस श्रेणी के महापुरुषों में अग्रगण्य थे। विवेकानन्द के गृहस्थ जीवन का नाम था नरेन्द्र। नरेन्द्र के अपने जीवन में ना जाने कितने गुणों का प्रस्फुटन हुआ था, यह एक सर्वथा अलग विषय है, लेकिन नरेन्द्र से विवेकानन्द बनने के लिए उन्हें कितने मील-संकेतक शिलाओं का त्याग कर आगे बढ़ना पड़ा था, इस तथ्य का परिचय निश्चित ही स्वतंत्र भारत के हर एक युवक के लिये प्रेरणा का विषय है। कैलिफ़ोर्निया में पासेडिना के शेक्सपियर क्लब में भाषण करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने स्वयं कहा था-

“मेरे लिये व्यक्तिगत रूप से निश्चित ही वह एक संक्रान्ति काल था। उस समय तक मेरे पिता की मृत्यु हो चुकी थी, कुटुम्ब में माँ के अतिरिक्त केवल हम दो भाई थे और सर्वत्र निर्धनता का प्रकोप छाया हुआ था। ऐसी अवस्था में हमारे परिवार की सारी आशाएँ मात्र मुझ पर केन्द्रित हो गयी थीं। उनको लगता था कि अब मैं ही उनकी नाव को पार लगा सकता हूँ। उस समय मैं दो दुनियाओं के बीच में भटक रहा था। एक ओर मुझे भूख से बिलखते हुए अपनी जननी और भाई के चेहरे दिखायी दे रहे थे, और दूसरी ओर मुझे लगता था कि मात्र रामकृष्ण परमहंस के विचार भारत और विश्व का कल्याण करने में समर्थ और सक्षम हैं और उनका प्रसार होना ही चाहिए।”

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विवेकानन्द दोषों को सुरक्षित रखना चाहते थे, ऐसी बात नहीं। उन्होंने कहा है- “बाहर से प्रकाश प्राप्त करने के लिये हमें निर्भीक होकर अपने घर के सब दरवाज़े खोल देने होंगे। संसार के चारों ओर से प्रकाश की किरणें हमें मिलनी चाहिए, जिसमें पाश्चात्य जगत का तीव्र प्रकाश भी शामिल है। जो दुर्बल, दोषयुक्त है, उसका नाश अवश्यम्भावी है। अगर वह नष्ट हो जाता है तो नष्ट हो जाये, उसे अपने पास रखने से हमें क्या लाभ होगा? और जो वीर्यवान है, बलप्रद है, वह अविनाशी है, उसका नाश कौन कर सकता है? और मात्र स्वदेश और स्वदेशवासियों की उपासना में ही विवेकानन्द सन्तोष का अनुभव नहीं हो पाया।” उन्होंने आह्वान किया- “हमें केवल अपने देश को जाग्रत नहीं करना है बल्कि अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा के द्वारा हमें विश्व विजय प्राप्त करनी है।”

“स्रज्योतिर्म उत्तिष्ठत जागृत प्राप्य वरान्निबोधत्।”

अर्थात् उठो, जागो, रुको मत, जब तक तुम अपना लक्ष्य प्राप्त न कर लो। कठोपनिषद (1.3.14) के इस मंत्र को स्वामी विवेकानंद के संदेश का ध्येयवाक्य कहा जाता है। स्वामीजी इस मंत्र का उपयोग युवा वर्ग और युवा मानसिकता वालों के लिए अक्सर किया करते थे।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम और सांस्कृतिक पुनरुत्थान की जो धारा पिछली सदी में बही और जिसने देश का काया कल्प कर दिया, उसके मूल में स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा ही समझी जाती है। यही कारण है कि देश उनके जन्म दिन को 1985 से राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाता है। अब तो यह तिथि अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस के तौर पर भी मनाए जाने लगी है।

उन्नीसवीं शताब्दी में जब धरती पर फैले अंग्रेजी राज में सूर्य कभी अस्त नहीं होता था, तब शिकागो की विश्व धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद का उद्बोधन भारतीय धर्म संस्कृति की जयघोष करता हुआ गूंजा था। जुलाई 1893 की धर्मसभा में उन्होंने जैसे एक जययात्रा की शुरुआत की। उसके बाद अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी आदि देशों में अपने देश और संस्कृति का संदेश पहुंचाया।

उन्होंने कहा था कि आने वाले दिनों में दलितों और स्त्रियों को विश्व का नेतृत्व करते देखा जा सकेगा। अंग्रेजी राज का प्रभाव दिनों दिन क्षीण होते जाने, सभी धर्मों के निकट आने तथा सभ्यता और संस्कृति के नए क्षितिज खुलने के उनके आकलन भी अब सही साबित होते जा रहे हैं। भारत में उनके आह्वान को राष्ट्रीय स्वाभिमान और युवा शक्ति को आंदोलित करने वाला माना जाता है।

अब से डेढ़ सौ साल पहले कलकत्ता के एक श्री संपन्न परिवार में जन्मे नरेंद्र नाथ को उदारता, त्याग, वैराग्य के साथ विवेक और तर्क की प्रतिभा जैसे विरासत में मिली थी। कहते हैं कि मां भुवनेश्वरी देवी ने उनके जन्म के लिए शिव की आराधना की थी। पिता विश्वनाथ दत्त प्रसिद्ध कानूनविद् थे। कलकत्ता हाईकोर्ट में उनकी धाक थी। विश्वनाथ दत्त का अंग्रेजी और फारसी भाषा पर इतना अधिकार था कि अपने परिवार को फारसी कवि हाफिज की कविताएं सुनाने में उन्हें बड़ा आनन्द आता था। बाइबिल के अध्ययन में भी वे रस लेते थे और इसी प्रकार संस्कृत शास्त्रों में भी। स्वामी विवेकानंद के पिता का स्वभाव था कि वे अपने पास आने वाले हर इंसान को सहारा देने के लिए हमेशा तैयार रहा करते थे। दान-पुण्य तथा निर्धनों की सहायता के लिए भी वे खुले हाथ से खर्च करते थे। इसी में उनकी सारी दौलत खर्च हो गई। फिर भी धार्मिक तथा सामाजिक बातों में उनका दृष्टिकोण तर्कवादी तथा प्रगतिशील था। किन्तु योग ऐसा कि पुत्र विवेकानंद के जन्म के बाद उन्होंने संसार से विरक्ति ले ली और साधु हो गये। उस समय नरेंद्रनाथ की अवस्था केवल पच्चीस वर्ष थी। स्वामी विवेकानंद ने अपनी आध्यात्मिक पिपासा के लिए उस समय के कई साधु सन्यासियों और आंदोलनों का सहारा लिया, लेकिन कहीं भी कोई समाधान नहीं मिला। इसी दौरान स्वामी रामकृष्ण परंमहंस से उनकी भेंट हुई और बस यहीं नरेंद्र के सारे द्वंद स्वाहा हो गए।

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उधर पिता के संन्यासी होने और 1884 में गुजर जाने के बाद नरेंद्र नाथ के परिवार को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। वे अन्यमनस्क (खोये-खोये) रहने लगे। कई बार तो उनके पूरे परिवार को भूखे ही रहना पड़ता था। स्वामी रामकृष्ण परमहंस को इस बात का पता चला तो उन्होंने सुझाव दिया कि दक्षिणेश्वर में माँ काली के श्रीचरणों में प्रार्थना करो। नरेन्द्रनाथ प्रार्थना करने तो गये किन्तु धन और सम्पत्ति के स्थान पर उन्होंने मांग ली केवल ज्ञान और भक्ति। गुरु ने शिष्य को दोबारा भेजा और कहा कि अब मांग लेकिन नरेंद्रनाथ से तब भी मांगते नहीं बना। तीसरी बार फिर ऐसा ही हुआ और नरेंद्रनाथ ने इस बार भी ज्ञान और भक्ति ही मांगी। बस यहीं से गुरु और शिष्य का नाता प्रगाढ़ होता गया।

स्वामी रामकृष्ण परंमहंस ने उन्हें संन्यास की दीक्षा दी और नाम रखा विवेकानंद। कहा कि तुम्हें अब मां काली का काम पूरा करना है। दीक्षा के तीन वर्ष बाद ही अगस्त 1886 में रामकृष्ण परमहंस का निधन हो गया। कुछ समय बाद उनके शिष्य संन्यासी भी अलग अलग दिशाओं में चले गए। स्वामी विवेकानंद ने 1888 से 1892 तक पूरे देश की यात्रा की और भारतीय धर्म तथा समाज को निकट से देखा। 1892 में 25 दिसंबर की संध्या को वे कन्याकुमारी में थे और उन्हें लगा कि उनके गुरु उन्हें विदेश यात्रा के लिए कह रहे हैं।

इसके बाद ही स्वामी विवेकानंद जुलाई 1893 में शिकागो की विश्व धर्म संसद में भाग लेने पहुंचे। चीन और कनाडा के रास्ते जाते हुए शिकागो पहुंचे हुए विवेकानंद की यात्रा के अनुभव और विवरण अत्यंत विशद हैं। धर्म संसद में स्वामीजी ने हिंदू धर्म और संस्कृति का जिस रूप में परिचय दिया, उसने वहां आए विद्वानों की ही नहीं बल्कि समाचार माध्यमों के जरिए दुनिया भर की आंखे भी खोल दीं। 1897 में भारत लौटने के दो साल बाद उन्होंने रामकृष्ण मठ और मिशन की स्थापना की।

जीवन का एक दूसरा पहलू : मां के प्रति नत वैराग्य

सन 1900 में स्वामीजी पेरिस में कांसटेनटिनोपोल (Constantinople) के लिए रवाना हुए। यह संभवत: पश्चिम देशों की उनकी आखरी यात्रा थी। मदाम कालवे और मिस मैक्लाउड समेत जब वे एथेंस होते हुए कायरो की तरफ जा रहे थे, तब परम विश्वस्त, स्वामी सारदानंद, विसेज बुल को पत्र लिख रहे थे कि मठ के फंड से स्वामीजी ने जो रुपए उधार लिए थे, वह रकम उन्होंने चुका दी है। मुकदमें के लिए उन्होंने अतिरिक्त रुपए भेजे हैं। मुकदमा उनकी चाची के विरुद्ध था, जिन्होंने पैसे लेकर, वचन देकर भी विवेकानंद की मां को संपत्ति का अधिकार नहीं दिया था। मां को बेलुड़ मठ में रख दिया गया था और स्वामीजी उनके खर्च के लिए भी रकम बेचते थे।

9 दिसंबर 1900 को स्वामीजी बिना पहले से बताए बेलुड़ लौट आए और मठ की दीवार लांघकर अंदर दाखिल हुए और खिचड़ी खाने बैठ गए। जिन लोगों ने उस दिन उन्हें देखा उन्हें पता भी नहीं था कि किसी भी शारीरिक विपत्ति की परवाह न करते हुए विश्व परिभ्रमण स्थगित रखकर घर का बेटा, घर लौट आया था।

वापस लौटते ही स्वामीजी मां की गृहस्थी की खोज खबर लेने को लाचार हो गए थे। इसका भी प्रमाण मौजूद है। पांच दिन बाद उन्होंने मिसेज उली बुल से अनुरोध किया था कि जो रुपए आप सीधे-सीधे भेजती थीं, अब से वह रकम मुझे भेजें। मैं चैक भुनाकर उसे रुपए देने का इंतजाम करूंगा। इस चचेरी बहन को नियमित रूपए देने की बात स्पष्ट नहीं है। मुमकिन है इस विमलहृदय संन्यासी ने चचेरी बहनों को कुछ रकम देने का वचन दिया था।

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जीवन के आखरी दौर में मां और नानी के पास स्वामीजी का आना जाना बढ़ गया था। जैसे स्वामीजी जब तब मामा नानी के पास चले आते थे, उसी तरह बीच बीच में मां भी बेलुड़ चली आती थीं और आवाज लगाती थीं – बिलू ऊ ऊ! इसके अलावा, बेटे की तरफ से बीच बीच में मां और नानी को फल-फूल साग-सब्जी आदि का उपहार भी जाता था।

वापस लौटकर, स्वामीजी जब पहली बार मामा विहीन ननिहाल पहुंचे तो हलचल मच गई। स्वामीजी नानी के घर में सभी को असीम खुशी देते थे। छात्र जीवन में स्वामीजी अपनी नानी के बेहद लाड़ले थे। उनकी नानी, मां से भी बढ़कर खूबसूरत थीं। बुढ़ापे में भी उनका रूप मानो फटा पड़ता था। प्रिय नाती के लिए तरह तरह के व्यंजन पेश किए जाते थे। स्वामीजी अपने संगी साथियों के साथ जाकर खा पीकर आते थे। उस घर के शुरको (व्यंजन) और मोचे (केले के फूल) की मसालेदार सब्जियां वे रीझ-रीझ कर खाते थे। एक दिन तो ऐसा आया कि उन लोगों का खाना पीना निपट जाने के कुछ देर बाद ही स्वामीजी अचानक फिर हाजिर हो गए। उन्हें शौक हो आया कि वे मां के पत्तल से उनका प्रसाद खाएंगे। उस वक्त मां के पत्तल पर सहजन का डांटा भर बचा हुआ था। किसी की भी बात पर कान न देकर काफी तृप्ति से स्वामीजी वे डंठल चबाते रहे।

स्वामी विवेकानंद जी के बारे में विभिन्न महान विभूतियों के कथन…

स्वामी विवेकानंद के उपदेशों को पढ़कर मेरे मन में देश के प्रति प्रेम और श्रद्धा में हजार गुना वृद्धि हुई है।
-महात्मा गांधी

स्वामी विवेकानंद आधुनिक भारत के निर्माता थे । उनके शब्दों में मृत हृदयों में भी प्राण फूंकने की सामर्थ्य है।
– सुभाष चंद्र बोस

भारत मां की मिट्टी और उनकी संतानों के रुप में स्वामी विवेकानंद सदा हमारे बीच मौजूद रहेंगें।
– अरविंद घोष

उनकी वाणी में संगीत था और उनके प्रत्येक मुहावरे में मंत्र जैसा प्रभाव। जब वे बोलते थे, तो लगता था कि हम शब्द नहीं सुन रहे हैं बल्कि किसी जादू के वशीभूत हुए जा रहे हैं।
-रोम्यां रोंला

ध्यान दें: इस Post का “एक दूसरा पहलू: मां के प्रति नत वैराग्य” Section स्वामी विवेकानंद के जीवन के अज्ञात और अनछुए पहलुओं पर प्रसिद्ध बांग्ला उपन्यासकार मणिशंकर मुखर्जी (शंकर) द्वारा लिखी पुस्तक “विवेकानंद : जीवन के अनजाने सच का एक अंश” से लिया गया है, जिसे आप चाहें तो यहाँ से खरीद सकते हैं।

Image Source: Bhakti Darshan.

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