The History of Fireworks in Hindi: Amazing Facts About Diwali Firecrackers

Diwali Celebration: जानिए कैसे शुरू हुआ आतिशबाजी का सफरनामा!

रंग-बिरंगी लाइटिंग और तरह-तरह की मिठाइयों के बाद जो चीज दिवाली की खुशियों को दोगुना कर देती है वो है पटाखों की धूम। सिर्फ दिवाली ही क्यों, जीत और जश्न का कोई भी मौका पटाखों के बिना अधूरा ही रहता है। फिर चाहे बात शादी-ब्याह की हो, क्रिकेट मैच की, फिल्म रिलीज की या चुनाव के नतीजों की। ये तो आपने पढ़ा होगा कि दिवाली श्रीराम जी के चौदह वर्ष का वनवास पूरा कर अयोध्या वापस आने की खुशी में मनाई जाती है, लेकिन क्या आपको पता है पटाखों की परंपरा कब, कहां, क्यों और कैसे शुरू हुई? तो चलो इस दिवाली जानते हैं पटाखों की कहानी।

कई देश घूमकर आए पटाखे!

भले ही बदलते दौर के साथ पटाखों का रंग, रूप और आकार बदलता चला गया, लेकिन हर दौर में खूब चले हैं फुलझड़ी और पटाखे। कई देशों का सफर भी पटाखों को खूब रास आया है। पटाखों की इस कहानी में आपको पता चलेगा कि हमारी दिवाली पर धूम मचाने वाले पटाखे चीन, इटली और फ्रांस की सैर करते हुए यहां तक पहुंचे हैं।

पटाखों की ये लड़ी चीन से चली!

कई हजार साल पुरानी बात है। चीन के लोग गांव में आने वाले जंगली जानवरों और बुरी आत्माओं को भगाने के लिए बैंबू (Bamboo) यानी बांस को जलाते थे। बांस खोखला होता है और उसमें बीच-बीच में गांठें होती हैं। जैसे ही ये आग पकड़ता, इसकी दो गांठों के बीच के खोखले हिस्से में मौजूद हवा गर्मी से फैलने लगती और एक अजीब सी आवाज होती। इस आवाज से डरकर जानवर भाग जाते थे। आगे चलकर चीन के लोग आतिशबाजी के इस अनोखे तरीके का इस्तेमाल नए साल के मौके पर हर बुरी बला और परेशानी को दूर करने के लिए भी करने लगे। पुरानी कथाओं की मानें तो पहला पटाखा बैंबू से होने वाली आतिशबाजी को ही माना जाता है। चीन में तो काफी समय तक बैंबू को ही विभिन्न आयोजनों के समय पटाखे की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा।

जानिए: नवरात्रि में पूजा के नौ दिन ही क्यों होते हैं?

फिर बने फुलझड़ी और अनार!

चीन में अनजाने में ही पटाखे के जिस रूप की खोज हुई थी, उसे मॉडर्न टच मिला इटली में। जब बैंबू का इस्तेमाल पटाखे की तरह होने लगा तो चीन के कीमीयागारों (रसायन वैज्ञानिकों) ने कुछ रसायनों को मिलाकर एक ऐसा मिश्रण (Mixture) तैयार किया, जिससे बैंबू को जलाने पर ज्यादा तेज आवाज आने लगी। ऐसा बताया जाता है कि 13 वीं सदी में इटली यात्री मार्को पोलो चीन से इसी मिक्सचर के कुछ सैंपल अपने साथ ले गए थे। इटली में इस मिक्सचर पर कुछ और प्रयोग किए गए, जिसके फलस्वरूप पटाखों के कई प्रकार सामने आए। इसके बाद इटली के साथ ही फ्रांस ने भी पटाखे बनाने की इस कला में महारथ हासिल कर ली। 1830 तक जिन पटाखों का इस्तेमाल किया जाता था, उनसे सिर्फ सफेद और संतरी रंग की ही रोशनी दिखाई देती थी। इसके बाद इटली में रसायनों का ऐसा मिक्सचर तैयार किया गया, जिनसे तेज आवाज के साथ-साथ रंग-बिरंगी चिंगारियां भी निकलने लगीं। आज इस्तेमाल होने वाली फुलझड़ियां, अनार, चखरी और रॉकेट इन्हीं पटाखों का आधुनिक रूप हैं। पटाखों का इस्तेमाल बढ़ने के साथ-साथ इसके उद्योग भी बनने लगे। हमारे देश में सबसे ज्यादा पटाखे तमिलनाडु के शिवकासी शहर में बनाए जाते हैं।

और अंत में पटाखे हमारी खुशियों के साथ जुड़े!

चीन, इटली और फ्रांस में खास अवसरों पर पटाखों का इस्तेमाल पहले ही किया जाने लगा था। इसके बाद 1486 में इंग्लैंड के राजा हेनरी VII की शादी का जश्न भी आतिशबाजी के साथ मनाया गया। इंग्लैंड के राजा चार्ल्स II ने तो खास तौर पर सेना के जवानों को पटाखे जलाने का प्रशिक्षण दिया, ताकि युद्ध जीतने का जश्न पटाखे चलाकर मनाया जा सके। इसके बाद अमेरिका में भी जुलाई, 1777 में मिली आजादी का जश्न पटाखों के साथ ही मनाया गया।

जानिए: अंक 7 (Seven) से जुड़े कुछ रोचक तथ्य!

अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन का स्वागत भी पटाखे चलाकर ही किया गया। धीरे-धीरे पटाखे हर रस्म, त्यौहार और जश्न का एक खास हिस्सा बनते चले गए। भारत में खासतौर पर दिवाली के त्यौहार पर पटाखे चलाने की परंपरा है। बच्चे, बड़े और बूढ़े सभी इस मौके पर पटाखे चलाते हैं। तो तुम भी तैयार हो न! बस अपनी सुरक्षा का जरूर ध्यान रखना।

आप सभी को दिवाली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं!

Leave your vote

0 points
Upvote Downvote

Comments

0 comments

2 Comments

  1. Rishi shra a

Reply

Ad Blocker Detected!

Refresh

Log in

Forgot password?

Forgot password?

Enter your account data and we will send you a link to reset your password.

Your password reset link appears to be invalid or expired.

Log in

Privacy Policy